बचपन का एहसास
जो मैंने महसूस किया व आपके साथ भी साझा कर रही हूँ । “ मंत्रों का ज़ोर-शोर से उच्चारण जो बिना माइक के भी सारे वातावरण को गुंजा रहा था” । घर के बाहर खड़े होकर भी बहुत अच्छा लग रहा था । “वह लय में गूँजते हुए शब्द मेरे लिए किसी जादू की झप्पी से कम नहीं थे” । “नहीं रोक पाई ख़ुद को , जल्दी-जल्दी अपने काम ख़त्म किए” । और नहा-धोकर पूजा के प्रांगण में पहुँच गई । अंदर कदम रखते ही सात्विक एहसास होने लगा । सबके साथ अंदर जाकर बैठ गये । हालाँकि मेरे जान-पहचान के क...