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बचपन का एहसास

                         जो मैंने महसूस किया व आपके साथ भी साझा कर रही हूँ ।                    “ मंत्रों का ज़ोर-शोर से उच्चारण जो बिना माइक के भी सारे वातावरण को गुंजा रहा था”  । घर के बाहर खड़े होकर भी बहुत अच्छा लग रहा था ।    “वह लय में गूँजते हुए शब्द मेरे लिए किसी जादू की झप्पी से कम नहीं थे” ।                     “नहीं रोक पाई ख़ुद को , जल्दी-जल्दी  अपने काम ख़त्म किए” । और नहा-धोकर पूजा के प्रांगण में पहुँच गई ।      अंदर कदम रखते ही सात्विक एहसास होने लगा । सबके साथ अंदर जाकर बैठ गये ।                   हालाँकि मेरे जान-पहचान के क...

आप भी तो टिप दोगे ना

                        लंबा सफ़र हो तो कहीं न कहीं रुकना ही पड़ता है ।  “चाहे बैठ कर  चाय ही क्यों ना पीनी पड़ें” ।      वैसे अबकी बार रुकने का मन तो नहीं था क्योंकि सड़क के दोनों ओर बहुत अच्छे  दृश्य थे ।                “ सड़कें भी बहुत अच्छी बनी हुई थी” । बिना रुके भी जाया जा सकता था । “लेकिन  दिल किया और कार की ब्रेक लगा भी दी” ।     सोचा,  एक बार घूमकर देख लेते  क्या है इस ढाबे पर ।                    “ फिर बैठकर चाय का ऑर्डर भी दे दिया” । तभी साथ वाली टेबल से लोगों का ग्रुप खाना खाकर उठकर चला गया ।         “बहुत शोर मचाया हुआ था । हमारी तरह घुमने-फिरने वाले दिख रहे थे” ।             ...

हैप्पी लास्ट दिन

                  फिर से नया साल आने वाला है । पुराने के बस 10 /11  दिन ही तो बचे हैं ।                  “लेकिन साथ ही बच गईं बहुत सारी ख़्वाहिशें ,सपने”  ।  कह सकते हैं कि उम्मीद जगा कर नए साल का स्वागत किया था ।                   “एक डायरी तो स्पेशल इसलिए लगायी थी कि जो याद आता रहेगा, साथ-साथ लिखते भी रहेंगे और महीने के हिसाब से पूरा भी कर लेंगे “।          सोच ही रही थी कि खिड़की से थोड़ी सी धूप चमकती हुई दीवार पर दिखाई दी ।                  जो सूरज के घूमने के साथ-साथ घूमती जाएगी फिर धीरे से ग़ायब भी हो सकती है । लेकिन फिर यह ख़्याल भी आया है कि कल जब  आएगी तो पहले ही आकर बैठ ...

ना ना ऐसा नही है

                        यहाँ आ जाओ सारे जल्दी से —ताई जी ने ज़ोर से आवाज़ लगाकर बुलाया । “चलो चलो, फ़ोटो करवा लेते हैं —तभी दूसरी तरफ़ से आवाज़ आयी” ।       यहाँ आओ पहले —  “गुलदाना ,लड्डू बताशे, सबके पैकेट भी बनाने है” ।                   सब को देखकर ऐसा लग रहा था  । “जैसे बहुत ही ज़्यादा काम था और समय कम था सबके पास” ।        क्योंकि सब दूर-दूर से आये हुए थे । वापिस रात तक अपने घर भी जाना था सबको ।                  “तभी ज़ोर से हँसी मज़ाक करने की आवाजें आनी शुरू हो गईं” । हम लोग भी काम बीच में छोड़कर बाहर देखने को लपके ।       “ गली-मोहल्ले से बहुत सारी  औरतें  आ चुकी थी” ।  ...

अगला मेला

                          अबकी बार ,  इस साल तो मेले ही मेले मिले जाने को । एक दीवाली के बाद शुरू हुआ तो उसके ख़त्म होते दूसरा शुरू ।    “किसी शादी समारोह से कम नहीं थे । कोई सरस मेला तो कोई जयंती मेला” ।                      मेले में जाने वाले जितने उत्साहित थे,वहाँ बैठे दुकानदार उनसे भी ज़्यादा ।  “मजाल कोई उनकी दुकान के आगे से बिना रुके निकल जाए”।       दूर से ही ग्राहक की आँखों के देखने के तरीक़े से ही पहचान लेते हैं कि किस सम्मान पर नज़र टिकी है ।                         “बीच-बीच में जड़ी-बूटी वाले बैठे हुए थे । जो अपने आपको जंगलों से आदिवासी समुदाय के बता रहे थे “।   ...

मैं काम वाली का बेटा

                        वह  सब बच्चों से  आगे  भाग-दौड़ कर रहा था । “एक-एक रास्ता ,सीढ़ियाँ ,सब कुछ ही पता था उसको” ।       बच्चे जब भी कुछ खाते  तो साथ में उसे भी दे रहे थे ।                           “जहाँ सब बैठते  बैड, सोफा  या फिर कॉलिन , वह भी बीच में ही  बैठा मिलता” । हमने उसको पहले तो कभी नहीं देखा था ।                   हैरानी तो तब हुई , जब हम बच्चों को बुलाकर उनसे मैथ्स के सवाल पूछ रहे थे  । पहेली बना-बना कर ।         “ उनको  गेम बता कर व्यस्त कर रहे थे ताकि कोई भी तोड़फोड़ न करें”  ।       ...