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Showing posts from December, 2022

कुर्ते की जेब

आज भी वही साइकिल , वही टिफ़िन  रास्ता भी तो वही था ,  बस थी तो ‘एक आशा नयी’  जो जगमगा रही थी आज, उसकी आँखों को ।  था आज दिन,   रुका हुआ मेहनताना मिलने का  चार क़दम का रास्ता,   बहुत लम्बा हो गया शायद , पर सब्र था मन में  हाथ था कुर्ते की जेब में  दिमाग़ था ‘ख़्वाहिशों की गिनती’ में । हमेशा की तरह  छोटा गिलास चाय ,और बिस्किट साथ  चाय के साथ बिस्किट की भी बढ़ गई मिठास , नहीं लिया आज उधारी से ,  बकाये के साथ, चुकता हुआ है आज तो ब्याज ।  ढीले से कुर्ते की जेब लटक रही थी  क्योंकि आज भार था पैसों का , बयान नहीं करना आ रहा दिल को  डालें हाथ  “कुर्ते की जेब”  में  बस झूम रहा था, सोच रहा था , जल्द-जल्द पैडल लग रहे थे  उतावला था घर जाने को ॥

वो प्यारा एहसास छुटपन का

बचपन जहाँ  बीता   वो दरवाज़ा ,वो जोहड़ ,बरगद का पेड़ ,  गली से गुज़रती, बग्घी की लाईनें  भैसों का एक साथ  जगह रोक रोक चलना  हवा की वही ख़ुशबू,  जो बसी हुई थी,  रूह के किसी कोने में अब भी  जी आयी हूँ सब पल, फिर से कुछ ही लम्हों  में ।  रिश्तेदारों के साथ  बड़े होने का  नहीं हुआ एहसास,  पुचकारते हुए सिर पर हाथ, ढेरों आशीर्वाद  हटने का मन ही नहीं उनके सीने से ,  रोकूँ भी तो कैसे , इन पलों को  भर-भरकर कैसे समेटूँ, अपनी यादों के झोले में । समय का तक़ाज़ा  चलने की इच्छा बिलकुल नहीं , अब शायद,  हो न हो यहाँ फिर से आना  गली का आख़िरी छोर  थक गई आँखें भी  निहार निहारकर, फिर से सब कुछ तरोताज़ा हो गया मेरा   “वो प्यारा एहसास छुटपन का ।।

दबा है दिल में

 साल तो बहुत दूर  घंटों का ही नहीं पता चल रहा , बीत रहे हैं बिना आहट किये ही नहीं होता महसूस पर जा तो रहे है , आँखें भी टकटकी लगाये रहती है  ‘दिखे तो कोई’ , खुलते  बन्द होते  दरवाज़े पे । कहना तो चाहते है  कहें भी तो किससे ?  पास से निकल रहे सब ‘छूकर जज़्बातों’ को ,  सचेत भी कर रहे है आते-जाते सभी  ‘ मत रहना ख़ामोश’  यूँ ही   बाँट लेना अपने दबे जज़्बात ‘किसी अपने से’ ,  बाट जोह रहे उस साथ की जो- सिर पर हाथ रख,  पीठ थपथपा दे प्यार से । बहुत कुछ है दिल में कहने सुनने को  तलाश भी रही है रूह मेरी  वो प्यार भरी नज़रें  वो बढ़ती बाँहें  और  वो अपनापन  एक अरसे से जो  “दबा है दिल में”             उसमें साझेदारी करने को ।।

चक्रव्यूह सी ज़िंदगी

कभी हथौड़ा तो कभी,  नुकीली कीलें  कट-फटकर हाथ भी,  बुरी तरह से छिले उतारता जा रहा ‘आरी’  चला-चलाकर  नया बनाने के लिए, वो ‘फटा-पुराना’ कपड़ा ।   माथे पर पसीना,  सिर पर ‘छोटी सी टोपी’  बड़ी शिद्दत से हाथ चलाता हुआ , शिकन नहीं है थोड़ी सी भी  ना ही परेशानियां झलकतीं दिखी चेहरे पर ,  ‘फ़ुरसत से बैठने की’ गुंजाइश आसपास भी नहीं   कमर झुकाकर बस, करता ही रहा काम ‘लगातार’ ।    रुकते ही हाथ ,  दिमाग़ भी करता है ‘सजग’   घर परिवार के हालात, याद दिलाता होगा , फिर ध्यान भटकता है- कभी पेट तो कभी, बच्चों पर , क्यूं बन गई “चक्रव्यूह सी ज़िंदगी”    बिना विचलित हुए शायद ही    ‘कोई दिन’ गुजरता होगा ॥

जगाने लगा है ज़मीर

 दुनियाँ के इस ‘मेले’ में खो गए है कहीं  कहाँ से शुरू किया था चलना अब याद ही नहीं । मुड़कर देखना चाहा पर  भीड़ ने बहुत ‘आगे धकेल’ दिया ।  खो गए वो रास्ता ही जिनको भी पकड़कर बढ़ना चाहा । किसी ने रास्ता गलत बताकर , आगे बढ़ा दिया  धक्का दिया आकर किसी ने ,     मक़सद से ही ‘भटका दिया’ । चलते रहे सारी उम्र  बिना सोचे समझे   न चाहा कभी वजूद तलाशाना              न ही चले संभल कर ।  जगा रही है अंतरात्मा—    क्या ‘खो दोगे’ सारी उम्र ?   गिरते-पड़ते  यूँ ही, ठोकरे खा खा-खाकर । होने लगा महसूस ‘बदलाव’, अब अंतर्मन में तन मन भी ‘रमने लगा’ आत्मविश्वास में  होना ही पड़ेगा ‘सचेत’ अब तो           “जगाने लगा है ज़मीर” ।।