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Showing posts from November, 2022

उतर जाना खरे

झोली छोटी पर, ख़्वाहिशें बहुत थी ‘रब  के अलावा’  हाज़िरी कहीं नहीं थी   उम्मीद रूकती तो  क़िस्मत पर ही आकर ,  खोटा सिक्का भी मिल गया अब                     ‘खनकते ढेर’ में जाकर । तक़दीर को कोसना कोई हल नहीं था  ज़रूरतें न हो सकी थी पूरी तो भी  ‘क़िस्मत का दोष’ तो कहीं नहीं था ।  सब होता ही चला गया अब   यह किसी ‘सपने से कम’ भी नहीं,    होने लगा एहसास बदलती फ़िज़ाओं का  ऐसा क़िस्मत और सपनों का तालमेल                     पहले तो कभी देखा नहीं ।    कदम खुद ही उठने लगे तो-  ‘साथ अपने भी’ खड़े हो गए आकर,  दिया आदेश  ख़ुदा और क़िस्मत ने ही शायद   मोड़ दो रुख़ हवाओं का,  बस “‘उतर जाना खरे” तुम भी अब   अपनी उम्मीदों पर ।।

कैसे आना हुआ

 खटखटाया फिर से ‘बेजान किवाड़ों’ को  हिलाई जोरों से ‘साँकल’ बजती ही रही जो     उस ‘बिना ताले’ के दरवाज़े पर बार बार ।  एहसास वही पुराना, दौड़ कर गले लग जाना  छूकर पैरों को ‘आशीर्वाद से झोली’ भर लेना              नहीं पूछा कभी भी कैसे आना हुआ । बदल गई रंगत वक़्त और बदलते माहौल की  ना   खुश आने वाले,  ना जाने वाले ही रहे   बस ‘औपचारिकता’ निभाते चल रहे है सभी । कैसे आना हुआ, पूछ लेते बैठने से पहले  बैठे रहना भी मजबूरी, बिठाने की भी मजबूरी    निभा भी रहे हैं ‘दिखावे की चादर’ लपेटे लपेटे ।   ‘सरकते हुए किवाड़’ ने ध्यान थोड़ा भटकाया  काँपते हाथों ने आज फिर से,  सीने से लगाया , ‘दुआओं की झड़ी’ हाथ सिर पर रखते ही मिली  नहीं पूछा आज भी और सुनाओ—                      “कैसे आना हुआ”  ।।

एक टीस

सालो बीत गए  पर अब भी याद आता है   वो दुख , जो पहाड़ सा बनकर टूटा था  ‘हिल गई थी नींव’ भी उस मज़बूत महल की , बिखर गया देखते देखते   खिला गुलदस्ता बद से बदतर हो गई स्तिथि   परिवार और मुखिया की । था नहीं मुक़द्दर में जो, शायद वही गया  यह तो ‘वो स्तंभ था जो,  ‘बेवक्त हिल गया’  बिना चिड़िया  चूज़े भी  चिल्लाते हैं याद में,   भूखे प्यासे ढूंढते है  ‘माँ को’   थोड़ी सी ही आवाज़ पे । बिना आहट किये बिछुड़ जाते हैं  जिनके बिना ‘साँस भी नहीं आती’  बहुत दूर  सफ़र पर गए शायद  इसलिए आवाज़ भी नहीं आती, उभर आया फिर ‘पुराना दर्द ,जोरों से सीने में  “एक टीस”   अब भी बची हुई है             दिल के ही किसी कोने में ।।

अल्फ़ाज़ का रुतबा

 बदल जाते हैं  अल्फाज़ अक्सर माहौल देखकर  न रुतबा है इनका ‘ना टिकते है’ जुबाँ देकर   देखा भी अक्सर ये बदल देते हैं हालात , बदल भी लेते है  ‘ख़ुद को’  बदलते,  हालात देखकर । होना चाहिए ‘मुक़ाम ऊँचा’   कहें गए अल्फ़ाज़ का , महसूस करवा दें जो, दिल की गहराई को  समझा दे ‘ख़ामोश रहकर’  भी  बढ़ते घटते जज्बातों को । ज़रूरत पड़ती ही है  उन नपे-तुले अल्फ़ाज़ की , बयां  भी करदे और ‘खामोशियों की ज़ुबाँ’ भी  बन जाएँ  हमेशा बरकरार रहना चाहिए  ज़ुबान से निकले “अल्फ़ाज़ का रुतबा”  दे दे तसल्ली बुझें दिल को   तन मन भी जाग जाए,  उम्मीदों की किरणों से ।।