कैसे आना हुआ

 खटखटाया फिर से ‘बेजान किवाड़ों’ को 

हिलाई जोरों से ‘साँकल’ बजती ही रही जो 

   उस ‘बिना ताले’ के दरवाज़े पर बार बार ।


 एहसास वही पुराना, दौड़ कर गले लग जाना 

छूकर पैरों को ‘आशीर्वाद से झोली’ भर लेना 

            नहीं पूछा कभी भी कैसे आना हुआ ।


बदल गई रंगत वक़्त और बदलते माहौल की

 ना   खुश आने वाले,  ना जाने वाले ही रहे 

 बस ‘औपचारिकता’ निभाते चल रहे है सभी ।


कैसे आना हुआ, पूछ लेते बैठने से पहले 

बैठे रहना भी मजबूरी, बिठाने की भी मजबूरी 

  निभा भी रहे हैं ‘दिखावे की चादर’ लपेटे लपेटे ।


  ‘सरकते हुए किवाड़’ ने ध्यान थोड़ा भटकाया 

काँपते हाथों ने आज फिर से,  सीने से लगाया ,

‘दुआओं की झड़ी’ हाथ सिर पर रखते ही मिली 

नहीं पूछा आज भी और सुनाओ—

                     “कैसे आना हुआ”  ।।

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