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एक उपजती उम्मीद

                          दिन क्या हमेशा ऐसे ही चलते रहेंगे । “एक दर्द दूर नहीं होता कि दूसरा दर्द बाँह पकड़ लेता है”। सविता रात सोते-सोते यही सोच रही थी ।       ब्याह से लेकर अब तक लगभग छब्बीस साल हो गए “लेकिन सुख का एक दिन भी  नहीं ” ।                      बीच-बीच में कभी एक-आध बार कोई मौक़ा ऐसा आ जाता है जब लगता है कि सब  वाक़ई ठीक हो रहा हैं  ।       लेकिन फिर  कुछ ऐसा हो जाता है “कि सब घूम फिर कर वहीं दिन , वैसा ही दुख दर्द” ।                    कैसी अजीब-सी ज़िंदगी है जो पीछा ही नहीं छोड़ रही । “आँखों के कोने भीगकर कुर्ता भी गीला हो गया  सोचते सोचते” ।    ...