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Showing posts from January, 2022

Fursat ke pal

 एक बार नहीं बहुत टटोला है ख़ुद को , लगता था फिर से उठा ले अपने मन को , रंग बिरंगे पन्ने अब भी बोल रहे है  एक एक करके अपनी गठरी खोल रहे हैं ।

Fursat ke pal

 पछिंयों ने आज शायद नई लय सीखी है, पत्तों संग झुम के टहनियां झुली है। काश उड़ सकू इनकी तरह ही मन में मेरी छोटी सी ख़्वाहिश जागी है।

Fursat ke pal

कई बार हवा का झोंका श़कुन दे जाता है  हल्के से पौधा पतों के संग मुस्कुरा जाता है  हवा से ज़्यादा पंछियों का शोर है  इस चमकती धूप के हाथों में सबकी डोर है

फ़ुरसत के पल

कुछ हवा से कुछ हाथों से हटायी है  पुरानी किताबों से आज धूल उड़ाई है  पलटे सारे  पन्ने एक एक करके  आठ वाया आठ का कमरा और खुली छत याद आयी है