उसकी खुशियों की चाबी
आज ही नीचे पार्क में घूमते देखा उनको । अकेली नहीं थी । “छोटी बच्ची थी साथ में , यही कुछ चार- पाँच साल की होगी” । उसके साथ इतनी ज़्यादा व्यस्त थी कि “आने-जाने वालों को भी नहीं देख रही थी” । बस उसको ही निहार रही थी । “और बच्ची भी अपनी एक -एक चीज़ दिखा रही थी । दादी —देखो मेरी क्लिप्स , देखो मेरी चूड़ियाँ” । “अरे दादी- आपने सेंडिल तो देखीं ही नहीं”। और वह इन सब में इतनी खोईं हुई थी कि मेरे बार- बार पुकारने पर भी नहीं सुना । “तब मैंने पास जाकर कंधे से हिलाया” । कब से आपको आवाज़ लगा रही हूँ । आपको पता ही नहीं चल रहा । ...