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Showing posts from January, 2023

ऐसी ही तो है वो

हाड़ माँस की नहीं ‘लोहे की बनी’ है शायद   चिंता सबकी है  बस नहीं है तो खुद की ही ,  ‘दो घुँट चाय’ की रहती है ललक उनको ,        है इसमें ही ख़ुश,  ऐसी ही तो है वो । ‘वार-फेरकर’  दुख उतार भगाना चाहती है सबके   कभी नज़र उतारने के लिए  जतन करती है नए नए , क्यों नहीं कर पाती कभी  ‘अपने लिए भी’ ये सब वो ।    बचपन से ही देखा है लगे हुए सारा दिन  आते हैं हमारे तो शनिवार इतवार भी  पर उनके लिए नहीं बना ‘कोई भी दिन’ , दर्द याद रहता है औरों का पर- ‘अपने घुटने का’ भूल जाती है वो ।  मासूम सा चेहरा है ‘मेरी माँ का’ हंसती तो ‘खिल जाती है’  कली सी, हमेशा बरसती है सबके लिए  प्यार और दुआएँ उनके दिल से    हाँ सच में  “ऐसी ही तो है वो” ।।

मन की रेलगाड़ी

‘मन’  है ही एक रेलगाड़ी  जिसमें सफ़र कर रहे,  विचार रहते हैं ‘उधेड़बुन में’  डिब्बे से डिब्बा जोड़कर, बिना विचलित हुए, हालातों को क़ाबू रखकर,  ‘देखते हुए अगत’  भी निर्धारित समय पर, अपने गंतव्य पर   पहुँचाता भी है ज़रूर । पटरी भी है टेढ़ी मेढ़ी बार-बार मोड़ भी आने हैं बहुत ,  ‘पकड़ भी रखनी’ है, कभी रुककर  कभी तीव्रता का सहारा लेकर , इच्छाएँ ही नहीं मक़सद भी       पूरे करते रहने है ज़रूर । पार करते हुए उलझनों को  ‘बनकर पटरी’ सा , पहियों से भी बनाकर तालमेल  समझते हुए ‘नज़ाकत वक़्त की’  बिना टालमटोल किए   इस “मन की रेलगाड़ी” को  उस आख़िरी स्टेशन तक    पहुँचना भी तो है ज़रूर ।।

बस आज की ज़रूरत

 मेरे हाथों से ज़्यादा,  हाथ काँप रहे थे उसके  ‘हाथ सुन्न’ कर देने वाली ठंड को  सहन कर करके। चमक गई थी आँखें फिर भी, देख मुझ ‘ग्राहक’ को  तेज कर दी आँच  गर्माहट देने मूंगफली को ।  देखते देखते ठंड होती जा रही थी काफ़ूर  कुछ ग्राहक देख  कुछ बड़ा ऑर्डर सुनके ,           और कुछ ‘लकड़ियों की आँच’ से ।   ‘फटी पुरानी बोरी’ को नीचे खींच-खींचकर  सिंहासन सा बना,  बैठ गया पल भर में । शायद बहुत वक़्त के बाद कोई आया है  ‘धूल मिट्टी पोंछ’ दिखाता रहा सामान को ।  डर था कभी शाम ढलने तक कोई आए ही ना  बातें सुनाकर छिपा रहा था  अपने ‘मन के डर को’ । बार बार दिखाता रहा पैकेट भी ‘रोकते रोकते’  “बस आज की ज़रूरत”  कैसे भी हो जाएं पूरी । कल की दाल रोटी फिर से  क़िस्मत और ऊपर वाले पे  मुस्कुराकर छोड़ दी मन ही मन में ।।       

रूकना नहीं अब

 शोर भी इतना, कि सहन न हो सके   पूरा दिन यूँ ही निकलता रहा उनके बीच में,  ‘आस’ जो पूरी होने का ख़्वाब देखकर,रूके थे   हुईं झल्लाहट तो भी, ‘क़दम पीछे’ ना हट सके ।  गहरे अंधेरे में, एक चमकती हुई रोशनी  ‘बुनती ही चली’ गई थी ख्वाबों को, पीछे-पीछे धीरे से, हिम्मत की चहल कदमी  जगाती रही  हौसलों के उस ‘सोये शहर’ को । बिना जगाये,  नहीं जागना था ये जगाना ही पड़ता  फिर भी झंकझोर कर पल-पल पढ़ाया पाठ भी होकर मजबूर     ‘कुछेक दुखते क़िस्सो’ को कुरेदकर । सामने दिख रहा   शायद यही है छोर  ‘बित गई रात’  अब तो होने ही लगी भोर, पकड़ कर उँगली,  सवेरा भी, ले जाने आ रहा है मंज़िल की ओर , “रुकना नहीं अब” गलती से भी  आलस छोड़, चलता जा बस अपने निर्धारित लक्ष्य की ओर ।।