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किताब का पेज

                                 आज मेरे दिलों दिमाग़ और मेरी किताब के पेज पर शायद उसकी बातें साँझा करना ही  लिखा है ।      “ रीवा’    हाँ रीवा नाम ही है उसका “।                   रीवा पहले तो अपने आपको अंदर ही अंदर समेटकर रखती थी हमेशा । “यह भी कह सकते है कि अपना मर्ज़ किसी को दिखने नहीं देती थी” ।                     दिखाती तो ऐसे,  जैसे सब पूर्णतः से ठीक चल रहा है । परिवार में सब कुछ बहुत अच्छा है ।   “चेहरे तक  भाव तो  आने ही नहीं देती थी” ।                  चार-पाँच साल लग गए उसको यहाँ तक पहुँचने में । वह तो शक्ल से ही बीमार...