“ दूसरी दुनिया “
“ बुआ” यह रिश्ता सुनते एक ही “नाता “ याद आता है ।पापा की बहन, दादा की बेटी या फिर रिश्तेदारी में रहने वाले अंकल की बहन । चौड़ी सड़क पर बहुत संकरी सी गली थी और बहुमंज़िला घर । बहुत सारे लोगों का डेरा होता था ,वो पुराना और खंडर जैसा मकान । यही पर रहती थी “बुआ” । सारे शहर की ख़बर होती थी उसे, घर-घर जाकर बधाइयाँ देना ,नाचना- गाना सब उसकी दिनचर्या होती थी सुबह से शाम होने तक । अपने जैसे ही बहुत से लोगों को सहारा दिया हुआ था उसने । वह छोटी -मोटी देसी दवाओं से इलाज भी करती थी । नज़र उतारने में तो माहिर थी ।हर कोई उसे अपने घर बुलाकर ले जाता था।और वह किसी को मना भी नहीं करतीं थी । दुनिया के परिवारों को “हँसी- ख़ुशी “रहते देखकर उसका भी मन विचलित होता होगा ।सबका ही सपना होता है ...