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Showing posts from February, 2022

“ दूसरी दुनिया “

          “ बुआ”  यह रिश्ता सुनते  एक ही  “नाता “ याद आता है ।पापा की बहन,  दादा की बेटी या फिर रिश्तेदारी में रहने वाले अंकल की बहन ।                 चौड़ी सड़क पर बहुत  संकरी सी गली थी और   बहुमंज़िला घर  । बहुत सारे लोगों का डेरा होता था ,वो पुराना और खंडर जैसा मकान  । यही पर रहती थी  “बुआ” । सारे शहर की ख़बर होती थी उसे, घर-घर जाकर बधाइयाँ देना ,नाचना- गाना सब उसकी दिनचर्या होती थी  सुबह से शाम होने तक । अपने जैसे ही बहुत से लोगों  को सहारा दिया हुआ था उसने । वह छोटी -मोटी देसी दवाओं से इलाज भी करती थी । नज़र उतारने में तो माहिर थी ।हर कोई उसे अपने घर बुलाकर ले जाता था।और वह किसी को मना भी नहीं करतीं थी ।                  दुनिया के परिवारों को “हँसी- ख़ुशी “रहते देखकर उसका भी मन विचलित होता होगा ।सबका ही सपना होता है ...

तसल्ली

कभी -कभी हार कर भी मिलती है ख़ुशी , भरोसा नसीब पर न कर के मेहनत ही चुनीं ,  तलाश रहे थे भटक कर दर- दर  जिसको  , थक हार कर वही तसल्ली  झोली में मिली ।                 नहीं हुआ पूरा देखा हुआ सपना तो क्या,                  दिखाया ही नहीं आईने ने देखना जो चाहा ,                   तह धूल की साफ़ की है आईने से भी अभी                    नहीं कहा हक़ में, पर रूह से तो मिलवाया । हालात तो किताबों से भी ज़्यादा है सिखाते , जो मिलता है माहौल उसी में सब रम जाते , देते हैं तसल्ली जीवन की परतें खोल -खोल के, फिर  बनकर  सबक  तक़दीर ही बदल जाते  ।।

वक़्त का पहिया

 फिर घूम गया वक़्त का पहिया                        गिर गया फूल टूट कर डाली से , महक रहा था जों बगिया में अब तक               जा पहुँचा उड़कर पूजा की थाली में  । खिला था जिनके साथ  महका था बगिया में               वह रह गए देखते  छोड़ गया पल भर में ।  याद करेंगी टहनियाँ  जिन पर था बसेरा                 जुदा कर दिया वक़्त ने  महकते फूलों का वो डेरा ।  छूट गया साथी, बगिया से भी बिछुड़ गया                सींचा बहुत माली ने पर पहिया वक़्त का चल गया  ।

घूरतीं आँखें

 मटमैले कपड़े फिर भी चेहरे पर हँसी, हाथ में कपड़ा कार साफ़ करता हुआ,  दूसरे हाथ से माँगने का इशारा कर रहा , घूरती ही रही वो बेबस दिखती आँखें ,बहुत दूर तक ।           आँखों का सूनापन हँसी को कर रहा था धुँधला,            क़ाफ़िला वाहनों का रुकते ,आ रहा था ख़ुशी से झूमता                  बेबस था पर बेबसी छलकने नहीं दे रहा ,                  कार साफ़ करने का मेहनताना भी माँग रहा ।               कोई पैसा दे रहा तो कोई सामान भी पकड़ा रहा,               तरस खाकर दे रहे कोई मज़दूरी समझ कर दे रहा ।              ...

“काली घटा”

करवट ली है बादलों ने भी जरा सी , साँसें तो हवा ने भी रोकी है , फिर उमड़ आये बादल काली घटा बनके  अब तो पूरी ताक़त हवा ने भी झोंकी है । आसमान पर बादलों का साया और गहराती ये घटा , ज़ोरों से चलती हवा और भी डरा रही है,  लोग घरों में बंद हैं तो पक्षी छिपे शाखाओं में , छम -छम करती बूँदें संगीत नया बना रही है । कोरे कागज़ जैसे आसमाँ पर चित्रकारी हो रही , हवा का लेकर सहारा काली बदली रंग फैला गई , दिन में ही रात जैसा हो रहा है अनुभव , देखते -देखते रिमझिम करतीं बारिश ,तूफ़ान में बदल गईं ।

बदलाव ढूँढती शाखाएँ

 उदास सूखी हुई शाखाओं को अब भी उम्मीद है,  झाँक कर बग़ल में पौधों को निहार रही है , ले रहा है करवट, मौसम धीरे -धीरे से , नए पड़ोसी बन कोंपलें पत्तो में बदल रही है । धूप और हवा का याराना देख रही ,  ख़ुशनुमा होते हुए मौसम को महसूस कर रही ,  बादलों संग ,धूप खेल रही है जैसे आसमॉ पर , झांक कर किरणें बादलों से, सहला इनको भी रही, आ रहें है तुम्हारे भी नयें दिन अब,आशा जगा रही हैं ।  पत्ते झड़ रहे हैं तो नई कोंपलें आ रही, शाखाओं ने भी नई पत्तियां देखकर बाहें फैलायी है , झड़ रहे  पत्तों ने जगह छोड़ी है अपनी ,  तभी  मुस्कुराती पत्तियाँ   झुमके के आयी है ।।

जज़्बा

 ऊँची इमारत  पर पंख फैलाता हुआ पक्षी,         नीचे  बैठे हुए पंछियों को बार -बार पुकार रहा है। “ देखो “ छू ही लिया आज आसमान को ,                 दूर तक देख रहा हूँ सारा जहां , ली है आज उड़ान हौंसलो ने            गले मिलकर , चोटियों को चूम रहा हूँ ।। तालाब किनारे बैठा परिन्दा  भी ,            ऊँची गर्दन करके नज़रें मिला रहा है । तुमने कर ही दिखाया हिम्मत बटोरकर,         लगता है आसमान भी तुमसे मिलकर इतरा रहा है, लग्न करके लांगी है कितनी ही बाधाएँ ,                                   जज़्बा था कुछ करने का , तभी ऊँचाइयाँ छू रहे हो  ।।

“उम्मीद “

कुछ मायूस लग रहे है ,बाट जोहते हुए मज़दूर , देख रहें है लगायेगा कोई आवाज़ , सुनना चाह रहे है “आ जाओ “ मिल रहा है काम, तलाशती नज़रें लग रही हैं ,बेबस और लाचार । टोकरी ,कस्सी , सिर पर रखे चले जा रहे , मेहनत करके ही खाना है ,ये प्रण लिए हुए, खड़े  मज़दूरों की भीड़ में, आने -जाने वालों को निहारते ,                                                                                 आयेंगी आवाज़ कहीं से तो ,विश्वास लिए हुए ।   स्वाभिमान और ख़ुद्दारी तो खुदा ने है दिए ,  माँगकर नहीं खाना है क़सम ये भी लिए हुए ,  खोखली होती हुई  “उम्मीदों “को पकड़ा है कसके ,  भरोसा नसीब पर भी, बढ़े जा रहे महेनत करने के लिए ।।

भटका हुआ चॉंद

रास्ता भटक गया या दुनिया को ,देखने है आया , रातें रोशन करने वाला चाँद ,आज दिन में निकल आया। निहारते रहते हैं जिसको, रात भर मुड़- मुड़कर , दिन में आया तो देखा ही नहीं ,किसी ने नज़र भी उठाकर। अन्धेरा दूर करने वाला ,रात को ही निहारा जाता है,  सच ही है ये सब ,वक़्त और स्थिति पर करता है निर्भर ।   अब तो सूरज नहला रहा है ,धूप में संसार को , थोड़ी सी रोशनी साथ मिल रही है चाँद को , दिन ढलते -ढलते ही फिर से ,चाँद यौवन में आएगा, अँधेरे को दूर करते हुए अपनी चाँदनी बिखराएँगा । चॉंद चल रहा है या बादल चल रहे , खुले आसमान में नज़ारे भी अद्भुत दिख रहे , उंगली पकड़कर ले जाना है ,तारों तक आज इसे , रह न जाए यही पर कभी, रातें रोशन करने वाला है ये ।

दिनचर्या

सड़कों पर शोर और हलचल हो रही चारों ओर ,           रेहडी से लेकर रिक्शा तक ,चले अपने काम है, कुछ बाट जोह रहे ग्राहक की ,किसी पर बहुत ही भीड है,            कर रहे महेनत ,पर भगवान के हाथ क़िस्मत की डोर हैं।    दूर उद्यान में बैठे ,वृद्धजन साथियों संग ,                गुनगुनाती धूप में ,क़िस्से-कहानी बाँट रहे हैं ।     सिमटती जा रही धूप में मुड़ रहे हैं साथ -साथ ,                 ताश के पत्तों में बादशाह -बेगम ढूंढ रहे हैं ।   लगे हैं सब अपनी दिनचर्या में ,व्यस्त हैं हर वर्ग ,           अपना दिनभर का काम और कमाई समेट रहे हैं । ख़ुशी और थकावट दोनों दिख रही हैं चेहरे पर,       ढलते हुए दिन के साथ अपने घरों को लौ...

प्रकृति की गोद

उगते हुए सूरज से दिन की शुरुआत होना,          फिर आ गया नया दिन ,सुखद अहसास होना, खुला आसमान दूर तक उठती हुई नज़र ,         पहाड़ों से आंखें मिलाकर ,फिर लौट आना,   मंद मंद चलती हवा का, दे कर ठिठुरन ,           हिला कर पेडों को, फिर पानी में लहर बन जाना।  कोहरे को पीछे हटाकर सूर्य का आना,          उठाकर जन-जीवन को, अपनी रोशनी में नहलाना , ठहरे हुए पानी का हवा से मचलना और,        झाड़ियों से टकराकर ,छिटक कर चले जाना , चहचहाट परिंदों की, हिलते हुए पेडों का शोर,        अच्छा लगा अनमोल पल प्रकृति की गोद में बीत जाना ।।

बिटु की चाची

        चाची ने अपना सब कुछ अपने बच्चों के नाम कर दिया था, पर जिस घर में रह रही थी ,वह अब तक उनके पास था।    बिट्टु के लिए उनके मन में ममता “मॉ “ जैसी ही थी । वे उसे बिटु ही कहकर बुलाती थी, बहुत सिखाने के बाद भी बिट्टु नहीं बोला ।            मैंने चाची के बारे में सुना था कि वह जवानी में बहुत ही सुंदर ,तंदुरुस्त और आत्म निर्भर रहने वाली महिला थी। सारा दिन काम करती नहीं थकती थी ,दिन में कई बार झाड़ू लगाना पानी से धोना इत्यादि सारा दिन लगी रहती थी ।और आज वो थोड़ा बहुत ही काम कर पा रही थी ।लगातार खड़ा होना उनके लिए अब मुश्किल था। शाम के समय चाची घर के बाहर बैठ जाती और  गली के सब बच्चे चाची को देखते ही उनके पास पहुँच जाते ।चाची उन्हें कोई कहानी या क़िस्सा सुनाती, इसलिए बच्चे शाम होते ही चाची का इंतज़ार करना शुरू कर देते थे ।चाची ने एक बार एक औरत की कहानी सुनाई, जो बिलकुल उन जैसी ही थी। चाची ने उसका अंत नहीं बताया और फिर किसी दिन पर छोड़ दिया ।बच्चे कल्पना करते रहे ,कहानी का अंत क्या...

बिटु की चाची

                 सामने गली में एक हाथ में लाठी और दूसरे हाथ को कमर पर रखें ,धीरे धीरे चलते हुए वह आ रही थी ।गली में कोई भी मिलता तो उससे हँस कर बोलती और हालचाल पूछती । पर आज वह ज़्यादा ही खिन्न नज़र आ रही थी, जैसे कोई भारी दुख आन पड़ा हो । रास्ते में ही मैंने उन्हें टोकना उचित नहीं समझा और ज़्यादा देर तक खड़े रहना शायद, उनके लिए मुमकिन नहीं था । वह लाठी को सोच-सोचकर रखती हुई अपने घर की ओर जा रही थी । थोड़ी देर बाद मैं उनके घर जा पहुँची ,वो अभी -अभी बैठे ही थी । मैंने उन्हें नमस्कार किया और उनके पास ही बैठ गई ।             जब भी उनके पास कोई जाता तो अपनी बीती हुई ज़िंदगी की बातें सुनती थी । उन्होंने बताना शुरू किया ,जब वो यही कुछ 6 -7 साल की थी , स्कूल पढ़ने को गयी हुई थी । किसी बात पर मास्टर जी ने डांट दिया और छड़ी से पीटा भी ।तो घर आकर सब को बताया  और यही नहीं बल्कि स्कूल जाना भी छोड़ दिया । और उसके बाद कभी भी स्कूल के रास्ते नहीं गई ।...

विश्वास

 लोग कहते हैं मन दुखी हो ,तो ही लिखता है ,  जिसको ज़माने ने तंग किया ,वहीं बयाँ करता है ,   नया दिन नयी सुबह निकलने से लेकर रात तक,        सब शब्दों की माला में पिरोकर देता है।।  इंद्रधनुष के रंगों सी ज़िंदगी,     सुख -दुख के चक्कर में छूट जाती है । मोतियों की माला की तरह ,       जाने -अनजाने में बिखर जाती है । करके कोशिश ,बटोर के मोतियों को ,     फिर माला बनके फूलों सी महक जाती है । मैंने ही नहीं मेरी सोच ने भी पैर पसारे हैं ,      विचारों की दिशा बदलकर ढूँढे नए नज़ारे हैं । इतनी भी बुरी नहीं है ये हमारी ज़िंदगी,       मकड़ी के जाले हटाकर सँवारी फिर दिवारे है ।

कोहरे की चादर

 आज तो प्रकृति की अदा ही निराली मिली ,          कोहरे ने ढक दिया सब ,नहीं कोई जगह ख़ाली दिखी । बाट जोह रहे हैं सभी दिखें कहीं रोशनी कोई ,           बढ़ती देख सूर्य की लालिमा आँखें चमक गई ।।  मेरी बगिया परिंदों के शोर के बिना सुनसान है ,                  पेड़ पौधे भी दिख रहें थोड़ा परेशान है । वो चहचहाट परिंदों की और हवा के झोंके ,       और चमचमाती धूप, इनसे ही तो रौशन जहानं है ।। चुनौती है हवा और धूप के लिए ,फिर भी ,         कोहरे की चादर को जहाँ से सिमेट रहे हैं । कभी कोहरा तो कभी हवा के झोंके ,            और इसी जद्दोजहद में सूरज भी लगे हुए है ।।

परिंदे

 पसरे हुए कहोरे में सुस्ताते हुए वृक्ष ,          सनसनाती हवा से जाग ही पड़ते हैं । किरणें फ़ैल रही है सूर्य की इस जहाँ में , चहचहाते परिंदे भी घोंसले छोड़ उड़ान भरते हैं ।। परिंदों ने आज शायद सूरज को भी उठाया है,         रोशन कर दो इस जहाँ को ख़ूब शोर मचाया है।  आज आँख-मिचौली नहीं चलेगी तुम्हारी ,          झुम के पेडों ने भी सिर हिलाया है ।।  आएँ हैं बहुत परिंदे आज मेरी मुँडेर पर भी ,          मौजूदगी दर्ज करवाई है आवाज़े लगा मोर ने भी । चमकती धूप ने पानी में चाँदी सी किरण फैलायी है,            शाखाएं भी परछाई को देख पहुत मुस्कराई है ।।

कलम🖋

एक लंबे अरसे बाद फिर आईं        आख़िर मैं फिर से ख़ुद को ढूँढ लायी  नई क़लम ,नई डायरी ,नया दिन ,       ज़िंदगी के पन्नों को फिर समेट लायी ।। मेरी क़लम ने साथ मेरा दिया है आज        मन के विचारों को दिया है नया एहसास  पुराने पन्नों ने बदला हुआ रंग दिखाया है         फिर भी गुनगुनाते शब्दों ने नवविश्वास जगाया है ।। आज बेझिझक चलना चाह रही है मेरी क़लम        सोच रही है सलाखों में बहुत रातें काटीं हैं  कुछ ख़ुशनुमा सा हो गया है मौसम भी         बादलों ने आसमा संग -थोड़ी धूप भी बाँटी है।।

सुबह

                         अध्याय - 4 वह रात होने तक पति का इंतज़ार करती रही। फिर बच्चों को सुला कर दरवाज़े पर खड़ी हो गई। गली में आते जाते लोगों को देखने लगी, तभी एक स्कूटर उसके घर के आगे रुका। एक लड़का उतर कर आया और उसके पति की मृत्यु का समाचार सुनाकर चला गया। वह तो जैसे सुनते ही पत्थर की बन गई ,उसकी आँखों के आगे सिवाय अन्धेरे के अब कुछ नहीं था। वह उसी भगवान से पूछ रही थी, जिसको उसने बार -बार  हर पल धन्यवाद किया था, “हे भगवान”  तूने ये क्या किया इतनी सारी ख़ुशियाँ भी दी और सभी को एक झटके में ही छीन लिया। वह दो दिन तक रोती रही पर अब उसे बच्चों के लिए जीना था ।             उसने अपने आप को अन्दर से मज़बूत किया और हौसले के साथ बच्चों को संभाला। और फिर उसे अपने पति के स्थान पर नौकरी भी मिल गई। घर का ख़र्चा वह आराम से चला लेती थी ।,परंतु उसकी आँखे अब भी तलाशती रहती थी, काश‌‌! उसका रमेश वापस आ जाए। पर भगवान की मर्ज़ी के आगे किसकी चलती है। वह अब भी भगवान पर भरोसा किये हुई थी।कोई चमत्कार ही ह...

सुबह

                        अध्याय  -  ३ यह देखकर वह बहुत रोई थी, पर तभी उसने शादी का फ़ैसला कर लिया था। घरवालों की मर्ज़ी के विरुद्ध उसने ये कठोर क़दम उठाना ज़रूरी समझा। रमेश की जाति दूसरी थी, इसलिए सभी रिश्तेदारों और सगे संबंधियों ने इस रिश्ते पर आपत्ति ज़ाहिर की। पर उसने तो अटल फ़ैसला कर लिया था।मॉ-बाप के विरुद्ध जाकर  उन दोनों ने शादी कर ली ।जब वह नए घर, नई दुनिया , में आयी तो बहुत ख़ुश थी। वह भगवान को बार-बार धन्यवाद कर रही थी। उसकी छोटी सी दुनियाँ हँसी-ख़ुशी के माहौल में आगे बढ़ने लगी। शादी के एक साल बाद ही बड़ी बेटी स्वीटी ने, इस घर के आंगन में फूल की तरह पॉव रखा। वो दोनों उसे देख- देखकर बहूत ख़ुश होते थे। स्वीटी के आते ही, मीरा के माँ बाप भी नाराज़गी छोड़कर उनसे मिलने आये। पुराने  गिले -शिकवे भुलाकर प्यार से गले मिले और उनसे मिलकर वह भी बहुत ही ख़ुश थी। जैसे उसने सारे संसार की ख़ुशीयॉ बटोर ली थी। स्वीटी  दो साल की थी ,तभी बेटे रोहित ने जन्म लिया। घर में दिवाली की तरह ख़ुशियाँ मनाई गई। सभी रिश्तेदार ...

सुबह

                           अध्याय २ वह न चाहते हुए भी रह नहीं सकती थी। सभी उसे भोली समझते थे, विश्वास ही नहीं कर सकते थे कि, वह किसी के इतना क़रीब भी हो जाएगी। जब उन्होंने अपनी ज़िंदगी एक साथ बिताने का निश्चय किया तो, घरवालों को बहुत ही आपत्ति हुई। रमेश के माता पिता ने तो एक बार बिलकुल ही मना कर दिया पर ,रमेश के ज़ोर देने पर मान गए। परंतु मीरा के घर वाले तो राज़ी होने को तैयार ही नहीं थे। इसी बीच मीरा को उसके छोटे बेटे ने आकर कहा, "मम्मी -मम्मी"  और वह अचानक डर गई। तब उसने देखा कि बच्चे स्कूल से घर लौट आए और खाना माँग रहे थे। परंतु पुरानी यादों में इतना खो गई कि वह समय को ही भूल गई।थोड़ी-सी देर बाद बच्चों के सो जाने पर वह फिर से पुरानी यादों में खो गई। जब उसके पिताजी ने इंकार कर दिया था तो ,वह कुछ भी न कर सकी थीं। जो पहले साथ-साथ चलने और जीने मरने के वायदे कर रही थी,आज चुपचाप सी थी। परंतु एक दिन जब वह ट्यूशन से घर आ रही थी तो, उसने देखा रमेश बिल्कुल बेहोशी की हालत में शराब के नशे में धुत उसके घर के आंगन में पड़ा ...

सुबह

मीरा आज दो बच्चों की माँ थी। वह बहुत ही आत्म निर्भर हो चुकी थी। उसके पति की मृत्यु हुए आज चार साल हो गए थे। उसे रह रहकर  पुरानी बातें याद आ रही थी, जब वह कॉलेज में पढ़ती थी। सहेलियों में सबसे सुंदर कही जाती थी। कॉलेज के अंदर आते ही सबकी नज़रें उसके चेहरे पर ही ठहर जाती थी। वह बिना किसी घबराहट के आत्मविश्वास से सबके पास बैठती थी कॉमन रूम में, उसके आते ही लड़कियों की नज़रें उस पर रुक जाती थी। सबके साथ मिल झुल कर रहना उसकी पुरानी आदत थी।  सहेलियाँ जब उसकी चर्चा किसी के साथ करती रहती थी तो उसे  बुरा  नहीं लगता था। वह भी उन्हीं लड़कियों में शामिल हो कर हँसना शुरू कर देतीं थीं। जब पहली बार रमेश ने उसको टोका तो  वह अंदर तक काँप गई थी। एक तो अजनबी और ऊपर से एक लड़का, परन्तु उसने हिम्मत दिखाई और फिर बातचीत शुरू कि।  फिर तो रमेश और उसका मिलना जुलना हर रोज़ होने लगा है ।       To be continued……..