बदलाव ढूँढती शाखाएँ

 उदास सूखी हुई शाखाओं को अब भी उम्मीद है,

 झाँक कर बग़ल में पौधों को निहार रही है ,

ले रहा है करवट, मौसम धीरे -धीरे से ,

नए पड़ोसी बन कोंपलें पत्तो में बदल रही है ।


धूप और हवा का याराना देख रही ,

 ख़ुशनुमा होते हुए मौसम को महसूस कर रही ,

 बादलों संग ,धूप खेल रही है जैसे आसमॉ पर ,

झांक कर किरणें बादलों से, सहला इनको भी रही,

आ रहें है तुम्हारे भी नयें दिन अब,आशा जगा रही हैं ।


 पत्ते झड़ रहे हैं तो नई कोंपलें आ रही,

शाखाओं ने भी नई पत्तियां देखकर बाहें फैलायी है ,

झड़ रहे  पत्तों ने जगह छोड़ी है अपनी ,

 तभी  मुस्कुराती पत्तियाँ   झुमके के आयी है ।।

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