दहलीज़
दहलीज़ । वास्तव में यह शब्द सुनते-सुनते ही बड़े हो रहे है । “लेकिन आप भी गौर करे कि उम्र की एक ही दहलीज़ तो नहीं होती”। “ पहले बचपन तक की , फिर जवानी की , फिर प्रौढ़ अवस्था की ,और फिर बुढ़ापे की दहलीज़” । सबसे बड़ी हो जाती है तो बुढ़ापे की । कोई-कोई जल्दी बुढ़ापे की दहलीज़ पर पहुँच जाता है । “ तो कोई उस दहलीज़ की अनदेखी करके ख़ुद को जवान और तन्दुरुस्त रखता है”। मेरे पास भी एक ऐसी ही शख़्सियत है “जिन्होंने बुढ़ापे की दहलीज़ को ताला लगाकर रखा है” । मुझे ज़्यादातर वह सैर करते भी नज़र आते है । ...