दबी ज़ुबान
वह कभी नहीं चाहती थी कि हमेशा यही रहे । “लेकिन उसके पति राम ने उसकी नहीं सुनी” । तीन मंज़िला घर बनकर तैयार हो गया था अब तो । “तीनों मंजिलों पर एक-एक परिवार आराम से रह सकता है “। बच्चे भी अपना कमा-खा रहे हैं । दोनों को एक-एक मंज़िल दे ही देते हैं ।”पास भी रहेंगे और इनका बाहर भी ख़र्चा नहीं होगा” । ऐसी बहुत सारी बातें सोच-सोचकर उथल-पुथल चल रही थी दिमाग़ में ,”नींद ही नहीं आ रही थी” । आज तो बहुत सारे निर्णय ले लिए थे उसके दिमाग़ ने —“कि नाती-पोतों को यहाँ कभी बाहर नहीं जाने दूँगी” । घर के अंदर ही खेलते रहेंगे । “उनके लिए माहौल ठीक नहीं है यहाँ का”। जहाँ पर उनका घर था वह मोहल्ला मज़दूर लोगों का था । ...