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सरदार जी अशोक

                   गली के एक छोर से दूसरे छोर तक पूरी निगरानी रखता था अशोक । “मजाल है कोई उसे बिना पूछे किसी के घर की घंटी बजा दें”  ।     आने-जाने  वाले सब पर नज़र रखता  ।                     जब कोई बोलकर जाता — घर का ध्यान  रखना ।  तो उसके दिमाग़ में एक बात बैठ जाती थी कि “भरोसा करके ही  कह कर गए हैं” ।        ध्यान रखना मतलब— उनके वापिस आने तक ज़िम्मेदारी और बढ़ गई ।     “फिर तो ज़्यादा चौकस होकर ड्यूटी करता” ।                        अशोक के बाल इतने बड़े नहीं थे ,ना ही वह सिख लगता था । “लेकिन हमेशा ड्यूटी पर पगड़ी पहनकर ही आता था” ।       एक दिन ...

एक था जसमत

                     उसका नाम तो जसमत  था । पर सब उसको राजू ही बोलते थे ।  “लाड़-प्यार का नाम”, जो एक बार टिक गया तो सारी उम्र वहीं रहेगा ।      “अगर लाड़-प्यार की बात करें तो सच में लाड़ला था” । जब तक छोटा था  ।               मामा ,नाना ,नानी ,भाई-बहन सब बहुत प्यार करते थे ।  यही नहीं,  मामा के बच्चे भी बहुत इज़्ज़त  देते थे उसको ।             “दें भी क्यों नहीं,  वह उनको अपने सगे  भाई-बहन  से भी ज़्यादा प्यार करता था” ।                    उसमें एक ख़ासियत थी । “कोई उससे कैसा भी व्यवहार करे फिर भी ख़ुश रहता” । चुप रहता और हँस के टाल देता ।          ...