Posts

Showing posts from June, 2022

हाथों की छाप

नहीं है ख़ुशी का ठिकाना  आज दो-दो घर हो गए उसके  पली-बड़ी जहां ,चल पड़ी है आज वहाँ से , छोड़ी है ‘छाप’ अपने हाथों की इन दीवारों पर  जिनके साथ बिते सालों-साल  हंस-खेल के ।  मुड़ मुड़कर देखती गई हाथों की छाप को  फिर लौट कर आऊँगी  ‘मिटने मत इन को’, गुज़ारिश हवाओं से भी क़र दी है जाते जाते            सहेजे रखना ख़ुशबू में, मेरी यादों को । दहलीज़ नई,नए लोग ,नई ख़ुशबू हवा की  रच-बस जाएगी इस आंगन की रूहों में भी , रहेगी कोशिश,  हमेशा- बनके ‘पीपल की जड़ों सी’ मज़बूत   मिट्टी का आख़िरी छोर छूने तक की  । जमाकर तसल्ली से रख ली है हथेली  अपना एहसास करवा कर दीवारों को ,  मिटे ना कभी, महेंदी भरें “ हाथों की छाप “                   अब मैं लक्ष्मी हूँ इस घर की ।।

भूल जाते हैं सब

कच्चा रास्ता और धूल-मिट्टी , बस - नहीं दिख रही, पक्की सड़क भी अब तो । वो रौनक़, वो खेलते बच्चों का शोर छूट गया कहीं,   बहुत ही पीछे । एक मन - उस भीड़ में घुल-मिल जाऊँ जाके  ‘दूजा मन’ दूर ही बैठा रहूंगा ,अब उन सबसे , नहीं सोच पा रहा है दिल ,  करना क्या है  ? तन्हाई में अकेले- या फिर सबकी ख़ुशियों में खुश रहूँ मिलकर , ‘बना ली ख़ुद ही’,  बड़ी दुविधा ये तो  बार-बार सोच रहा मन ये सब, विचलित होकर । चलो “भूल जाते हैं सब”,  बदल लें थोड़ा ख़ुद को,‘बिना खोले अतीत’ के दरवाज़े,  जायेंगीं कहाँ  आ ही जायेंगीं,  एक दिन  भूलीं-भटकीं ख़ुशियाँ भी, ढूँढते हुए हमें,                                   हमारे पीछे-पीछे ।।                           

बदले ना मौसम

वो छन -छन  करती गूँजा रही थी घर को  चूड़ियाँ हाथों में ढेर सारी, पैरों में पायल भारी , चेहरे को पढ़ नहीं पा रही थी मैं फिर भी  कभी उदास थी तो, कभी मुस्कुरा रही थी , बदल रहा था मौसम के जैसे, चेहरा उसका  तेज आँधी तो कभी धूप सी ,खिल खिला रही थी । पैरों में  ‘आलता’  वो भी गहरा लगा हुआ   दिखा रहा था सुंदरता उसके पैरों की  उभर आये छालों को भी था छिपाये हुए , अपनी ही छमछमातीं धुन को सुन रही थी  झुक-झुककर देख हँसे जा रही थी , शायद आज दिल में सुकून है इसके  बदल न जाए मौसम बिन बताये  ये भी होगा डर , इसके तो मन में । भाग-भागकर  आज काम भी निपटाया  जाते जाते होले से मुस्कुरा हाथ भी हिलाया,  दुआ करेंगे हम भी ,तुम्हारे लिए ख़ुदा से  “बदले ना मौसम”  बिना बताए ,बिना पुछे तुमसे ।।

सफ़र

वैसे तो हैं ,  अपनी भी, ख़्वाहिशें थोड़ी सी,       अभी शुरू ही किया है, ज़िंदगी का सफ़र तो असलियत में,          रास्ते तो बना ही रहे थे लगातार हम भी,   एक अरसे से । महसूस कर रहे है अपने संग  चलते हुए लम्हे   हँसते-रोते  सरकाते जा रहे है अच्छे बुरे दिन ,            छाँट-छाँट कर चुन भी रहे हैं, उम्मीदों की कलियाँ              भर रहे है झोली में ,शायद खिल जाएँगी ही एक दिन ।  लगता हैं बहुत दूर निकल आए हम  जरा रूककर, मुड़कर,  पीछे देखें तो सही,          देखें  पकड कर अपने भविष्य के, उड़ते बिखरते पन्ने            सन्नाटा पसरा हुआ है ,छायी हुई तो थोड़ी ख़ामोशी ही ।  थोड़ा सुस्ता-कर  लें तो  लें-  ज़िंदगी के सफ़र का हिसाब-किताब जरा, ...

थामना हाथ थोड़ा सा

 देखा बहुतों को  टूटते बिखरते ,दिन-रात अपनों के लिए तरसते हुए,  थे तो अज़ीज़ रिश्ते ,जो निभा ना सके  आये ही नहीं आस-पास ज़रूरत पड़ने पर  आना,   ‘थामना हाथ थोड़ा सा’ , शायद यही बोल के पुकारते होंगे   आख़िरी साँस तक थी, एक उम्मीद  ‘नज़रें टिकी रहती थी’  दरवाज़े पर । उम्र भर तलाशते रहे वजूद इस गुमनाम दुनिया में,  रिश्ते भी बेजोड़ ही तराशे थे फिर ‘चूके तो चूके’ कहाँ से,  लगता है हो ही गई चूक कोई ,परखते हुए उनको ।  लग गई नुकीली कोई चीज़ आकर,  ज़िंदगी के ही ग़ुब्बारे को  गिले-शिकवे किससे होंगे अब , किससे होंगी ‘चार बातें’ बैठकर ।  नहीं रहा अब कोई   “थामना हाथ थोड़ा सा” , बोलकर पुकारने वाला तुमको । रह गए — बहुत ‘कहानी क़िस्से’  ,पीछे उस सुनसान कमरे में  उस बिस्तर, उस खिड़की और  उस , चरमराते हुए दरवाज़े में  ॥॥

सजग पहरेदार

रात चाँदनी थी  तो ज़िक्र भी चाँद का ही रहा,  टिमटिमा रहे थे साथ में वो भी,        पर,  उनका तो कहीं नहीं था । रोशन करते रहे जहां ,सारी-सारी रात,  सब खड़े रहे एक ही जगह और चॉंद घूमता ही रहा , चॉंद से भी सजग पहरेदार थे वो आसमान के    पर झोली भर , तारीफ़ें तो चाँद ही बटोरता रहा । भरी हुई थी थाली आसमाँ की, जगमगाते सितारों से   टूट रहा था फिर भी, मन्नत पूरी करता गया ज़माने की,  था चॉंद की ही पनाह में ही  ,कर कुछ ना सका वह भी   नम हुईं पलकों से ,लाचार बेबस ,देखता ही रह गया  ।                             टूट जाने से एक तारें के  ख़ाली तो नहीं हुआ ,फिर भी आसमाँ  डटे हुए हैं साथी तारें अब भी वहीं पर,  रात के “सजग पहरेदार”  है ये,             नहीं जायेगें यूँ ही छोड़कर  ।।

ख़त्म ही नहीं होंगी

 ज़िंदगी तो खाली पन्ने है  चाहते है मनचाही कहानी ही लिखना , गुज़ारनी या फिर जीनी है सुकून से  सलाह मशवरा भी खुद से ही तो है करना । कभी बुलाकर कभी बिन बुलाए ,आती रहेंगी जीवन में  इन मुसीबतों का क्या, ये तो कभी ख़त्म ही नहीं होंगी ।  सुख चैन से होते जाए बसर  ना लौटेंगे फिर ये अनमोल पल, आती रहेंगी छन-छन कर खुशियां  बस पकड़े रखना उम्मीदों का आँचल । बुनने मत देना कच्चे धागों को,अपने रिश्तों की नाज़ुक डोरी  लगाते ही रह जाओगे वो गाँठे , जो कभी ख़त्म ही नहीं होंगी । दिन भर की भाग दौड़  उस पर कमर तोड़ मेहनत , न चैन से बैठने की फ़ुरसत  ना ही साँस लेने की मोहलत । जब मिल जाए कुछ पल राहत के ,वो पल ही जी लो  बढ़ती घटती रहेंगी , यूँ ही ख़्वाहिशें ,  उनका क्या                            वो तो कभी “ख़त्म ही नहीं होंगी”   ।।