थामना हाथ थोड़ा सा

 देखा बहुतों को 

टूटते बिखरते ,दिन-रात अपनों के लिए तरसते हुए,

 थे तो अज़ीज़ रिश्ते ,जो निभा ना सके 

आये ही नहीं आस-पास ज़रूरत पड़ने पर

 आना,   ‘थामना हाथ थोड़ा सा’ ,

शायद यही बोल के पुकारते होंगे 

 आख़िरी साँस तक थी, एक उम्मीद 

‘नज़रें टिकी रहती थी’  दरवाज़े पर ।


उम्र भर तलाशते रहे वजूद

इस गुमनाम दुनिया में,

 रिश्ते भी बेजोड़ ही तराशे थे

फिर ‘चूके तो चूके’ कहाँ से,

 लगता है हो ही गई चूक कोई ,परखते हुए उनको ।


 लग गई नुकीली कोई चीज़ आकर, 

ज़िंदगी के ही ग़ुब्बारे को 

गिले-शिकवे किससे होंगे अब ,

किससे होंगी ‘चार बातें’ बैठकर ।


 नहीं रहा अब कोई  

“थामना हाथ थोड़ा सा” ,

बोलकर पुकारने वाला तुमको ।

रह गए —

बहुत ‘कहानी क़िस्से’  ,पीछे उस सुनसान कमरे में 

उस बिस्तर, उस खिड़की और 

उस , चरमराते हुए दरवाज़े में  ॥॥

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