घर के दरवाज़े
आज उसको घर के दरवाज़े बंद करते हुए देखा जो ज़्यादातर खुले पड़े रहते थे । वैसे तो साल-भर मिलते रहते हैं । “लेकिन कल वाली “सोनी” को देखा तो लग ही नहीं रहा था कि वह पहली वाली ही है” । ऐसा लगा कि उसको कभी समझ ही नही पाये । “दिल करता उसका तो , अच्छे से बोल लेती नहीं तो मुँह फेरकर निकल जाती थी” । अभी तो धीरे-धीरे उसके रहन-सहन का पता चल रहा था । चुलबुली सी भी है तो कभी बिल्कुल चुप -चाप रहने वाली । कभी कभार ऐसे लगता “जैसे बहुत कुछ गंवाकर बैठी है अपनी ज़िंदगी में” । ...