दृढ़ निश्चय
अध्याय ४ फटे-पुराने कपड़े और उलझे हुए बाल,गिड़गिड़ा कर लोगों के आगे हाथ फैलायें जा रही थी ।कितनी ही मजबूरी रही होगी इसकी ,ये दिन देखने पड़ रहे थे ।अच्छी-बुरी नज़रों से गुज़रना पड़ रहा था । भीख माँगना किसे अच्छा लगता है ,पर मज़बूरी इंसान से सब कुछ करवा देती है । पड़ोसियों को भी शायद भनक लग चुकी थी पर किसी ने भी आकर सिर पर हाथ नहीं रखा, मिलना तो दूर की बात है पानी तक नहीं पूछा ‘जब सगे ही अपने नहीं तो पड़ोसी किसके’ ।अपने पैरों को घसीटते हुए चली जा रही थी क्योंकि पैर भी उसका साथ नहीं दे रहे थे । उसकी ज़िंदगी ग़ैरों ने नहीं अपनों ने रूला दी थी । सही मायने में वह आज ‘अनाथ’ हुई थी ,अपने भाइयों की कड़वी बातें अब भी उसके दिल में तीर के जैसे चुभ रही थी । ...