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Showing posts from March, 2022

दृढ़ निश्चय

           अध्याय ४              फटे-पुराने कपड़े और उलझे हुए बाल,गिड़गिड़ा कर लोगों के आगे हाथ फैलायें जा रही थी ।कितनी ही मजबूरी रही होगी इसकी ,ये दिन देखने पड़ रहे थे ।अच्छी-बुरी नज़रों से गुज़रना पड़ रहा था । भीख माँगना  किसे अच्छा लगता है ,पर मज़बूरी इंसान से सब कुछ करवा देती है ।                     पड़ोसियों को भी शायद भनक लग चुकी थी पर किसी ने भी आकर सिर पर हाथ नहीं रखा, मिलना तो दूर की बात है पानी  तक नहीं पूछा ‘जब सगे ही अपने नहीं तो पड़ोसी किसके’ ।अपने पैरों को घसीटते हुए चली जा रही थी क्योंकि पैर भी उसका साथ नहीं दे रहे थे । उसकी ज़िंदगी ग़ैरों ने नहीं अपनों ने  रूला दी थी । सही मायने में वह आज ‘अनाथ’ हुई थी ,अपने भाइयों की कड़वी बातें अब भी उसके दिल में तीर के जैसे चुभ  रही थी ।       ...

दृढ़ निश्चय

        अध्याय ३             सब सुनकर प्रिया हैरान हो गई और ‘पुतले के जैसे’ खड़ी रह गई ,जैसे उसके शरीर से जान निकल गई हो। , दिमाग़ और दिल ने काम करना बंद कर दिया हो । जिस चीज़ की उसने कल्पना भी नहीं की थी, वो आज हो रहा था।  जिनके लिए उसने अपने सुख-दुख त्याग दिये ,अपनी पूरी ज़िंदगी खपा दी उन्होने ही उसकी इज़्ज़त नहीं की, तो अब उनकी पत्नियां क्यूँ  ही करेंगी ।                   घुट-घुटकर एक-एक दिन निकल रहा था । हर रोज़ सुबह उठते दिमाग़ में एक ही ख्याल आता  ”आज पता नहीं क्या होगा”।फिर वो दिन भी दूर नहीं रहा, जिसका कोसों दूर भी दिमाग़ में ख़याल नहीं आया था । एक हाथ से चौखट का सहारा लेकर चुपचाप सुनती ही रह गई ,जब उसकी भाभियों ने उसे सीधे-सीधे आकर घर से निकलने को कह दिया । भाइयों ने भी उनकी हाँ में हाँ मिला दी कि घर में ज़्यादा सदस्य हो गए हैं और जगह की कमी लगने लगी है, “आप...

दृढ़ निश्चय

           अध्याय २      प्रिया एक ऑफ़िस में क्लर्क की पोस्ट पर थी ,और छुट्टी होने के बाद भी अतिरिक्त काम करती थी ताकि ज़्यादा पैसे मिले सके ।वह ख़ूब मेहनत करके अपने भाइयों को पढ़ा रही थी , उन्हें अच्छी पोस्ट पर देखना चाहती थी ।                    प्रिया में बहुत ख़ूबियाँ थी, पड़ोसियों के साथ भी अच्छे संबंध थे और सभी उसकी मदद करने को तैयार रहते थे । उसकी मेहनत  रंग लाई और दोनों ही भाई अच्छे नंबरों से डिग्री कर गए ।नौकरी के लिए आवेदन देने के, महीने के भीतर ही दोनों को नौकरी भी मिल गई ।                      भाइयों को नौकरी मिलते ही, उसने आराम से घर रहने की सोच ली और अपनी नौकरी छोड़ दी। ताकि वो अपने भाइयों का घर-परिवार संभालने में उनकी मदद कर सकें। अब प्रिया के दिल में एक ही बात थी उनकी...

दृढ़ निश्चय

          अध्याय १        प्रिया ‘बहुत दुखी मन’ से अपने घर को छोड़कर जा रही थी और उसे विदा करने वाले कोई और नहीं  ‘उसके भाई ‘ ।उसे घर से निकाल कर ‘जीत’ अनुभव कर रहे थे और उनकी पत्नियाँ तो बहुत ही ख़ुश थी जैसे किसी “बोझ “से छुटकारा मिल  रहा हो ।प्रिया  ने उन्हें समझाने की कोशिश की, यह भी बोला कि”जैसे तुम कहोगे मैं वैसे ही तुम्हारे साथ रह लूँगी” ।और तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी। पर उन्होंने तो जैसे सोच ही लिया था कि आज इसको घर से निकालना ही है।प्रिया के समझाने का उन पर कोई असर नहीं पड़ा । लेकिन फिर उसने वहाँ रूकना उचित भी नहीं समझा ।             प्रिया ने अपनी ‘आंसुओं से भरीं आँखें ‘दुपट्टे से साफ़ की ओर अपना सामान लेकर चल पड़ी ।रास्ते में रह -रह कर बिती बातें याद करती जा रही थी, आख़िर वो तो उसका ही घर था। उसे वो समय याद आ रहा था जब वो बेसहारा हो गए थे ।उनके माँ बाप सड़क हादसे में दुर्घटना का शिकार हो गए और हमेश...

पंख समय के

उड़ता जाता है समय  पंख लगाकर                     किसी की पकड़ में नहीं आता    बदलती परिस्थितियों का बस                       अहसास करवा कर निकल जाता ।   गुजर जाते हैं अनचाहे  दिन भी                   अच्छे की इंतज़ार में  इकट्ठी होती रहती हैं खट्टी ,मीठी यादें                        कांच जैसे  ज़िन्दगी के जार  में । कभी नहीं  छूटने देना  दामन               ‘ आशाओं ‘ को थामे ही रखना  टूटे हुए कांच के ऊपर से       ...

आख़िरी डगर

कहने को ही नहीं ,  वास्तव में भी ‘घर का ताला’ और गली का   था पहरेदार  बिलख रहे सारे ,हादसे ने कर दिया सबको बेहाल   न घड़ी देखी   ना ही सोचा कोई  पहर  बस चल दिया बन मुसाफ़िर ,अपनी आख़िरी डगर । हिला गया सारा आँगन, एक ‘हवा का झोंका’ आकर  उठ गया सिर से ही साया और ‘ख़ाली हो गया’ बिस्तर ,  चेहरे हैं उदास आँखों में पानी का है समुद्र   बन ही गया ‘बहाना’ चलने का ,उस आख़िरी डगर । ये ‘कमी खलेगी’ कोई न ले पाएगा जगह उनकी  फिर चल पड़ती है ,नहीं रुकती ज़िंदगी यूँ किसी की ,  रोकना तो पड़ता ही है ,आँसुओं का सैलाब मगर । बहुत दूर मिली है मंज़िल उनको  नहीं आएंगे वापस लौटकर अब तो  वक़्त ने ही तय कर दी  उनकी “आख़िरी डगर” ॥

बेहतर वक़्त

गंदगी के ढेर में कमर तक धँसे हुए  मुँह नाक को आधा-अधूरा ढके हुए , नहीं सुध अपनी जरा भी उनको,  बिना वक़्त देखे, गीला कचरा-सूखा कचरा                  छाँटते जा रहे हैं झुक-झुककर ।  बनाना पड़ा रोज़गार ये ,हर वक़्त जंग जीत रहे   मजबूरी कहें या वक़्त का फेर ,सब कुछ झेल रहे ,  पूरे दिन मज़दूरी करके  मिलते हैं कमाई के पैसे                     तभी चुल्हा भी चढ़ता है जाकर । भूखे पेट दिन-रात कर रहे है ,जी-तोड़ मेहनत नहीं छोड़नी कसर कोई ,भविष्य करना है सुरक्षित ,  थके-हारे घर पहुँचकर  मिट जाती है थकान तो                            बच्चों की मुस्कान देखकर । अपनी फ़िक्र नहीं , खपा रहे ख़ुद को, ज़िंदगी बच्चों की बनाने में , नहीं फँसने देना उन...

रंग

‘होली’शब्द सुनते ही  नाचने लगते हैं इंद्रधनुष से रंग  ना कोई गोरा काला ,सब एक जैसे ही  रंगों में लथपथ । होली के दिन तो हवा भी निराली ही बहने लगती है  बच्चों से लेकर बड़ों तक को  रंगीली दुनिया में ले जाती है । उड़ा रहा है गुलाल  चल रही रंगों भरी पिचकारियाँ   रंगों में सरोबार होकर ज़ोर-शोर से खेल रहे  बज रहा हैं संगीत ,नाच -गा रही है टोलियाँ । बहुतों की होली के रंग ही फीके है  ना रंगों का झरोखा ही दिख रहा घर में ।  रंग-बिरंगे  रंगों का एहसास ही नहीं आज उनको ख़ामोशियों का भंडार बना हुआ है आंगन में । परिवार की ख़ुशी में ख़ुश तो दुःखों में दुःखी हैं  हाथ जोड़कर  “दुआ”खुदा से कर रहे , देना ख़ुशियाँ सबको  झोली भर-भर के  हमें भी रंगों से नहलाना  अगली होली में  आंगन को लाल गुलाबी रंग से भर देना अगली होली में ।।

परख

रिश्ते होते हैं पतंग की डोर जैसे जो परख कर बाँधीं जाती हैं , कभी ख़ुद कट जाती है तो कभी कोई काट के चला जाता है, कभी ख़ुद उड़ जाती है,कभी कोई साथ लग कर उड़वा देता है ।  रुठना फिर मनाना रिश्तों की दुनियादारी का हिस्सा है,  कभी समझ से ऊपर उठ कर तो, कभी पानी जैसे शांत बनकर संभाले जाते हैं । इज्ज़त और प्यार ,लेने का देना बन गया हैं अब तो, परखने के चक्कर में रिश्तों की डोर, टूट कर छूट जाती है ।  कभी-कभी ग़ुरूर में कुछ ऐसा हो जाता हैं  उम्मीद फूलों की होती है मुट्ठी काँटों से भर जाती हैं । सोचते हैं जो रिश्ते हमें भीतर से तोड़ रहे हैं , वह टूट ही जाए तो ही अच्छा है पर- नहीं रह पाते उनके बिना जो बसते हैं दिल के कोने कोने में , और “परखते” ही रहे तो बचे-खुचे भी बह जाते है शिकवों में ।।

ठहरा पानी

ठहरा पानी तालाब का, गहरा कीचड़ बनने लगा , निकल आए किनारे ऊपर, नीचे सब पत्तों से ढक गया । खिलते जा रहे है कमल के फूल ज़ोर-शोर से खुश हो जाता दिल अब, सब मनमोहक बन गया ।              बचते हुए निकलते थे, जिसको बिना देखे,               आज आँखों को सुहाने लगा है ।               रुक रही है नज़रें बार-बार देखने को,               अब जन्नत सा एहसास करवा रहा है । धीरे-धीरे चलती हवा से लहरा रहे हैं मतवाले से, बदल गई हैं तस्वीर ,वजह बन गए मुस्कुराने की । झुम रहे हैं फूल पत्तों को फैलाकर तालाब में, अब तो पहचान, बन ही गई “ठहरे पानी”की ।।

नया कदम

छुप-छुप कर बालकनी से झाँकती , असमंजस से भरा चेहरा  नहीं पता उसको कि तेरा कल कैसा होगा ,  स्कूल का झोला मिलेगा या झाड़ू पोंछा ही करना होगा ।  बीत जाएगी क्या उसकी भी ज़िंदगी मॉं  की ही तरह, कुछ तो सोचा होगा क़िस्मत ने ,आगे बेहतर क्या होगा । मॉं ने भी मिन्नतें की होंगी भगवान के दरबार में,  न रूलने देना बचपन को ज़िम्मेदारी में उलझाकर । निकलेगा क्या,नया दिन नयी आशा बनके  पलट जाएगा क्या अतीत भी,तूफ़ान सा उड़कर । नहीं बनना क़ैदी फिर से उन लोहे सी जंजीरों का , अब “नया क़दम” रखवा ही दे  ‘ऐ ज़िंदगी’ एहसास आज़ादी का दिलवाकर ।।

ज़िद्द जीतने की

डर दिल में जगे या किसी को देखकर लगे , खोखलापन भर जाता है ज़िंदगी में भी । निकल जाये डर ‘रूह’ से अगर , आमना -सामना हो ही जाए डटकर , तो मंज़िल का रास्ता मिल ही जाता है । अंदर से झकोर  कर उठाना होता है ख़ुद को , अपनी ‘कमज़ोर सोच’को ही बनाना होता है ताक़त,  रखते हुए क़दम हौसलों की सीढ़ियों पर,  जकड़ते हुए डर को रौंद कर आगे बढ़ना होता है ।                  डर पर ही नहीं बेबसी और लाचारी पर भी,                  बुलंद करके हौसले जीत जाना होता है।                  जीतने की ज़िद्द कर ही ली तो ,                 जख्मों को भी भूलाकर आगे बढ़ना होता है।                मदद ख़ुद की करें...

स्वाभिमानी

अब भी याद आ रही है  धुँधली सी परछाई उसकी , गोदी में लटकाए हुए बच्चे को  चली जा रही,  बोझ नहीं बनना इसलिए काम तलाश रही, ढूँढ रही है रोज़ी-रोटी गलियों में भटकते हुए , ज़िल्लत के नहीं, इज़्ज़त के दो टूक के लिए  । ताने लोगों के ‘तलवार से ज़ख़्म’ दे रहे  मदद की उम्मीद वो भी पत्थरों की बस्ती में ।              ना सपने देखे आँखों ने ,न टूटने का डर है               तमाशा नहीं बनाना ज़िंदगी को               पर सँवारनी तक़दीर भी है                 छिड़ ही गई लंबी जंग ये                  स्वाभिमान और भूख से है ।  ज़िंदा ‘ज़मीर’ भी रखना,हाथ भी नहीं फैलाना है  ढूंढनी है मंज़िल अपनी और ‘स्वाभिमान’ भी ब...

कुछ नया सा

  सब्र देखा है आज सूरज और हवा का   बादलों संग खूब खेला है आसमान भी ,   खिलने लगे हैं फूल उजाला होते ही   महकने लगी हैं भीनी-भीनी ख़ुशबू भी ।।                आईने की तरह चमक गया है सारा जहां                  धूल तो बारिश ने जैसे हाथों से हटायीं है,                 पेड़-पौधे भी कुछ नये-नये से लग रहे                  और उन पहाड़ों की तो, छटा ही निराली है  ।।    जगह -जगह रुका हुआ है पानी     छोटे गड्ढे तो तालाब ही बन गए ,    टपक रहे हैं पत्ते भी अब तक शाखाओं के    नाच रहे मोर ,बगिया को चार चाँद लग गए ।।           ...

दूसरी दुनिया

        अध्याय  ४          पीड़ित और वे लोग जो ख़ासकर  ज़िंदगी से परेशान हो चुके थे, वो बिमला को ढूंढते-ढूंढते उनके ‘डेरे’तक पहुँच जाते थे । हम लोगों से ‘अलग’होते हुए भी ज़रूरतमंदों की इतनी मदद करती थी कि हम भी नहीं कर सकते ।उनकी यही खूबियाँ उनको मानवता से भी ऊपर रखती थी ।                 मॉं जैसी  ममता रखने वाली बिमला ने उस औरत का भी साथ दिया जो जीने की इच्छा छोड़ चुकी थी । पति ने घर से निकाल दिया और माँ-बाप ने उसे आने नहीं दिया । पति के घर ही रहने को वापस भेज दिया  “मर या जी” वही तेरा घर है । बेचारी बाप के घर से निकाली जा चुकी थी और पति ने दरवाज़ा बंद कर दिया था । पूरी रात छोटी बच्ची के साथ सड़क पर रोती रही । बिमला बुआ  को जब यह बात पता चली तो वह बेचैन हो उठी उसी समय उस लड़की के पास पहुँच गई । पेटभर खाना खिलाया और समझाया कि हमारे साथ घर चलो । एक औरत बीच सड़क सुरक्षित नहीं हैं । पर म...

दूसरी दुनिया

          अध्याय ३        बिमला का जन्म होते ही उसके “सगे माता-पिता” ने उसे ‘किन्नरों” के हवाले कर दिया था। बच्चे के पैदा होने की ख़ुशी मातम में बदल चुकी थी  और घर में सिवाय चुप्पी के कुछ भी नहीं था ।”माँ “ रोयी भी होगी या नहीं ,ये भी नहीं पता । जिसने ‘नौ’ महीने अपने ‘खून से सींचा’ क्या वो पल-भर में भूल गई होगी। आख़िर थी तो उसकी औलाद ही।                   जी हाँ , जिनको पूरा शहर “बुआ” कहता था वो एक किन्नर थी। हाथों की लकीरों में ‘तक़दीर’ बदल गई थी । उसका नाम “बिमला” उसके माँ बाप ने नहीं दिया था ।वो नाम भी उसको “किन्नर समुदाय” ने ही दिया था  वो बेघर हो चुकी थी । ना ही  रिश्ते बचें थे, ना वो दुनिया । ना ही उसका बचपन सरल था, ना ही जवानी और बुढ़ापा तो बदहाल ही हो रहा था । मुझे नहीं समझ आया कभी ,उनसे बचना  क्यों है ।            ...

दूसरी दुनिया

                                अध्याय  २              बहुत ही नेकदिल और अच्छे विचारों का भंडार थी ।चालाकी,भेदभाव  जैसा कुछ भी उनके स्वभाव में नहीं था ।हम जैसे पत्थरदिल लोगों के बीच में भी  “सहज”रह रही थी ।किसी से भी कोई गिला-शिकवा नहीं ।               ग़रीब परिवारों का तो सहारा बन जाती थी ,पैसों से भी मदद करती थी और उनके बच्चों को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी भी लेती थी । उनकी बेटियों की शादी भी करवाती थी और ज़रूरत पढ़ने पर उनकी रोज़ी रोटी कमाने में मददगार बन जाती थी ।               याद है मुझे कैसे ,एक रोते -बिलखते परिवार को सहारा दिया था । घर से थोड़ा दूर जाकर ही, गरीबों की  छोटी सी बस्ती थी  या  यूँ कहें कि  चार-पाँच  घर ही थे ।बहुत ज़ोरों से तूफ़ान आया और तेज़ बारिश भी ...