दूसरी दुनिया
अध्याय २
बहुत ही नेकदिल और अच्छे विचारों का भंडार थी ।चालाकी,भेदभाव जैसा कुछ भी उनके स्वभाव में नहीं था ।हम जैसे पत्थरदिल लोगों के बीच में भी “सहज”रह रही थी ।किसी से भी कोई गिला-शिकवा नहीं ।
ग़रीब परिवारों का तो सहारा बन जाती थी ,पैसों से भी मदद करती थी और उनके बच्चों को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी भी लेती थी । उनकी बेटियों की शादी भी करवाती थी और ज़रूरत पढ़ने पर उनकी रोज़ी रोटी कमाने में मददगार बन जाती थी ।
याद है मुझे कैसे ,एक रोते -बिलखते परिवार को सहारा दिया था । घर से थोड़ा दूर जाकर ही, गरीबों की छोटी सी बस्ती थी या यूँ कहें कि चार-पाँच घर ही थे ।बहुत ज़ोरों से तूफ़ान आया और तेज़ बारिश भी । “कच्ची मिट्टी “से बने घर इतनी भारी बारिश में कहाँ टिक पाते ।थोड़ी देर में ही “बचाओ बचाओ “ कोई “बुआ “को बुलाओ की आवाज़ सुनाई देने लगी थी । मकान भी कच्चे और ऊपर से छत भी कच्ची पूरी “मिट्टी से बनी हुई” और बीच में एक “लोहे का बड़ा सा टुकड़ा” छत को सहारा देने के लिए । इतनी तेज़ बारिश में छत ही बह गई और उन मासूमों के ऊपर जा गिरी । पूरा घर पानी भर से गया और छत के नाम पर “पानी बरसाता हुआ आसमान” । बुआ तक जब बात पहुँची , तो वो अपने दो-तीन साथियों के साथ वहाँ पहुँची ,दवाइयों का इंतज़ाम भी किया और खाने पीने का भी। जब तक उनकी छत ठीक नहीं हुई ,उन लोगों का सहारा भी बनी और उनकी जवान बेटियों को अपने घर भी रखा ।
रोबीली आवाज़ ,लंबी क़द- काठी वाली, मज़बूत और स्वाभिमान से जीने वाली ‘बिमला’। सब की इज़्ज़त करती थी ।बदले में सारा शहर उसको बेटी के जैसे मानता था । पर बेटी “कहने भर”से कोई बेटी नहीं बनती और न ही माँ-बाप बन जाते हैं । To be continued……..
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