मिट्टी डाल गुज़रे समय पर
मन सोच रहा बेचैन होकर, उलझने आती है क्यूँ क्यूँ नहीं रहता जीवन एक जैसा सदा , हालात बिगड़ने की वजह, बनती ‘छोटी सी बात’ समेट कर क़ाबू करें सब कैसे हो ही जाता है सब ‘समझ के परे’ । हर पहलू पर ज़िंदगी भी नज़र रखती हैं अपनी ‘बस में नहीं होता कुछ भी’ पर चलता रहता बिना रूके ही बेवजह ख़ुश रहने की रहती है कोशिश , ‘वजह’ आती तो भी, फिसल जाती है ‘रेत की तरह’ हैं दुविधा क़दम क़दम पर, ‘क्या सँभालें’ क्या छोड़े बस सरके जा रहे यही सोच सोचकर । पलक झपकते, हाथ हिलाते ,नहीं होगा कुछ भी आगे बढ़ना ही होगा अब, नज़रें रख अब ख़ुशियों पर, “मिट्टी डाल गुज़रे समय पर” बस ‘अब जाग , आज नया सवेरा एक बदली हुई दुनिया से मिलवाने आया है , तुमको ।।