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Showing posts from February, 2023

मिट्टी डाल गुज़रे समय पर

  मन सोच रहा  बेचैन  होकर, उलझने आती है क्यूँ  क्यूँ नहीं रहता जीवन एक जैसा सदा ,  हालात बिगड़ने की वजह, बनती ‘छोटी सी बात’ समेट कर क़ाबू करें सब कैसे    हो ही जाता है सब ‘समझ के परे’ । हर  पहलू पर  ज़िंदगी भी नज़र रखती हैं अपनी  ‘बस में नहीं होता कुछ भी’  पर चलता रहता बिना रूके ही  बेवजह  ख़ुश रहने की रहती है  कोशिश , ‘वजह’ आती तो भी,  फिसल जाती है ‘रेत की तरह’    हैं दुविधा क़दम क़दम पर,    ‘क्या सँभालें’ क्या छोड़े बस सरके जा रहे यही सोच सोचकर ।   पलक झपकते,   हाथ हिलाते ,नहीं होगा कुछ भी  आगे बढ़ना ही होगा अब,  नज़रें रख अब ख़ुशियों पर,  “मिट्टी डाल गुज़रे समय पर”  बस ‘अब जाग , आज नया सवेरा  एक बदली हुई दुनिया से   मिलवाने आया है ,  तुमको ।।

ढलता हुआ चाँद

साफ़ सुथरा माथा आसमाँ का  चाँदनी  रात उस पर , चुप्पी पसरी हुई  बादलों को भी मिली नहीं इजाज़त ,  इस मनमोहक रात में विचरने की । आज तो चमक रहा था, बस एक ही   बनके बिंदी आसमाँ के माथे पर ,  वो चाँद,  जो नारंगी रूप लेकर  लगा हुआ था अकेले ही, रात रोशन करने में । गज़ब की सुंदरता थी आज, खुले आसमाँ की  छिटक गए थे बादल भी दूर दूर तक,  जीव जंतु पेड़ पौधे यहाँ तक कि- धीरे धीरे चलती समीर भी , सब निहारे जा रहे थे एक-टक  होकर । वैसे तो ढलता हुआ चाँद था ये  ख़ूबसूरती क़ायम थी अब भी उसकी  अलग अलग अंदाज़ से मन मोह रहा  सबका,  ये “ढलता हुआ चाँद” पहन कर संतरी चोला  मन को संतुष्टि  दे रहा था  यूँ ही                    हमेशा की ही तरह ।।

दिन बदल जाएँगे

बूट पालिश से भरे हाथ  चले जा रहा ‘लटकाये झोले को’  सीना ताने, हल्की सी मुस्कुराहट होंठों पर ,  कानों साथ,  आँखें भी थी चौकन्नी   देखता जा रहा  मुड़ मुड़ के पीछे  कभी ‘कोई पुकार रहा हो’,  पीछे से ही । ‘दौ रुपये में’  चमक जाएंगे करवा ही लीजिए  काम तसल्ली से होगा,  विश्वास तो कीजिए ,  ‘कितनी ही बार’ दोहरा रहा था,अपने शब्दों को  आवाज़ आते भाग लेता, ‘आतुर था’ काम करने को ।  ‘बिना काम’ के  पैसे लेना भीख दिख रहा था उसको  ‘बस मेहनत का’ ही चाहिए अपनी झोली में , कैसे   ख़ुद्दारी कूट-कूटकर भर गई अभी से  इस मासूम ‘छोटी सी जान’ में । बदलेंगे जल्द ही दिन अब तो,   उस ‘बाबा ने’ भी कह दिया, शांत बैठकर कुछेक देर वहीं पर ‘हाथ की लकीरों को’ घूरता रहा , रुकते ही रेलगाड़ी के, मस्तमौला सा  कूदता फाँदता चला गया ,  “दिन बदल जाएँगें” जल्दी ही    यक़ीन मन में, अब तो बिठा लिया ।।

बाज़ार के दिन

 हो गई चहल -पहल शुरू फिर से  रौनक़ बाज़ार में ही नहीं, गलियों में भी ,  छोटे बड़े सभी दुकानदारों ने  सजा दिए अपने गलियारे , नहीं रहे रेहड़ी-फड़ी वाले भी पीछे । दुकान जितना सामान  एक छोटी सी जगह में जमा लिया । दिखने लगा रंग बिरंगा  अब दूर तक बाज़ार सारा ,   ग्राहकों को रिझाने के लिए     कर रहे जतन , बढ़ाकर अपना दायरा । ख़ुशी दिख रही है चेहरे पर  असली दाम पर छूट देखकर , ख़रीदारी की लिस्ट, बच्चों की भी बढ गई   नया कुछ तो,ढूँढ रही है नज़र भी बच्चों की ,  भागदौड़ करते नन्हे  मुन्नों ने   माहौल ही ख़ुशनुमा बना दिया । पलट रहे है शायद सूनसान पड़े “बाज़ार के दिन” भी लग रहा है जाती हुई ठंड ने  रंग जमाना  शुरू कर ही  दिया ॥