ढलता हुआ चाँद
साफ़ सुथरा माथा आसमाँ का
चाँदनी रात उस पर , चुप्पी पसरी हुई
बादलों को भी मिली नहीं इजाज़त ,
इस मनमोहक रात में विचरने की ।
आज तो चमक रहा था, बस एक ही
बनके बिंदी आसमाँ के माथे पर ,
वो चाँद, जो नारंगी रूप लेकर
लगा हुआ था अकेले ही, रात रोशन करने में ।
गज़ब की सुंदरता थी आज, खुले आसमाँ की
छिटक गए थे बादल भी दूर दूर तक,
जीव जंतु पेड़ पौधे यहाँ तक कि-
धीरे धीरे चलती समीर भी ,
सब निहारे जा रहे थे एक-टक होकर ।
वैसे तो ढलता हुआ चाँद था ये
ख़ूबसूरती क़ायम थी अब भी उसकी
अलग अलग अंदाज़ से मन मोह रहा सबका,
ये “ढलता हुआ चाँद” पहन कर संतरी चोला
मन को संतुष्टि दे रहा था यूँ ही
हमेशा की ही तरह ।।
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