कोथली देखने ज़रूर आना
दादी हर रोज़ नहा-धोकर बाहर दरवाज़े पर ही खाट बिछाकर बैठ जाती थी । “आते-जाते लोगों को देखती रहती” । पर अब कुछ दिनों से वह बेचैन सी टहल रही थी । “कभी चारपाई पर बैठ जाती, तो कभी डण्डे को पकड़कर, सड़क तक जाकर फिर से वापस लौट आती” । फिर बैठकर इधर-उधर देखने लग जाती । “दो-तीन दिन तो मैं भी सब देखती रही” । एक दिन लगा कि पूछ ही लेती हूँ । “आख़िर बात क्या है ? जो इतना परेशान रहने लगे हैं” ।थोड़ा समय निकालकर उनके पास जा पहुँची । “उनकी परेशानी जानने के लिए” । ज्यों ही उनके पास पहुँची । नमस्ते...