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Showing posts from August, 2022

थोड़ी सी नमी

मॉं तो नहीं थी पर, ‘मॉं जैसी’ ही लगी मुझे  झाँकती ही रही उनकी आँखों में  जिनमें शायद मिल सकूं कहीं, दिखे छलकता हुआ अपनापन मिल जाए ‘अपने लिए परवाह’  थोड़ी सी । लटक जाऊँ जाकर पीठ पर धीरे से  ‘लिपटा लूँ’ अपनी बाहों को फैलाकर, महसूस ही हो जाए,  शायद  अतरंगी सा एहसास पास जाकर, बेचैन भी हुई ,  ‘देख बेचैनी उनकी’  उनकी वो कुछ ढूंढती हुई सी नज़रें  टटोलते हुए सामान को  ‘झोले में’ जैसे खो गया हो ,यहाँ ही आकर । थी समुद्र सी गहराई,  फिर भी ख़ाली सी आँखें दिखी  “थोड़ी सी नमी” जो, छुपी हुई थी एक कोने में   कह रही थी बहुत कुछ—         एक एक क्षण में ।। 

सावन की वो पींग

महसूस ही नहीं हुआ ‘कब बड़े हो गए’  भाग-भागकर गलियों में खेलते खेलते बिना छतरी के ही बारिश में घूमते-फिरते । ‘झूले के पेड़’ के लिये  चक्कर लगता था, पूरी मण्डली का घूम-घूमकर ,छाँटकर देखा जाता , सबसे ऊँचा दिखता हो  हो जो हरेभरे पत्तों से लदा हुआ , मोटी रस्सी डालने के लिए  मोटी टहनी और मज़बूत तना । याद आता है अब भी  ज़ोर-ज़ोर से खूब ऊँचे तक ‘पींगना’ कभी सीधी तो कभी टेडी होकर  पतली रस्सियों से खींच-खींचकर  पिंग का ‘गोल गोल’ घुमते ही रहना ।  टपकती हुई बूँदे पत्तों से, फिर से   ‘पींग और गीत’ याद दिला रही है   पीछे छूट गई “सावन की वो पींग ”  जिसको,रूह मेरी अब भी पुकार रही है ।।

मनोबल

 आसमाँ छूती इमारत ने,  मनोबल कुछ ऐसे बढ़ाया  सोच ऊँची, ख़्वाब ऊँचे,पर- मन पर मज़बूत  ‘पकड़ ख़ुद की’, झुकना मत, ‘बिना गलती के’  बनाए रखना  आत्मविश्वास को अपना साया,  चलते रहते है बहुत इम्तिहान,  हर रोज़ ही, झिझकना नहीं, फिसलना नहीं  मुट्ठी में रखना संतुलन,  अपने तन-मन का । रचा हुआ  ‘विधी का विधान’ नहीं बदल पाया कोई भी,  आज तक करके भरोसा ख़ुद पर, बस बढ़ता जा वक़्त का क्या, ये तो बदलता है क़दम क़दम पर । हो सकता है- दुआओं और आशाओं का, बन ही जाए ताल-मेल, सोचना पड़ जाये, एक बार तो ‘खुदा’ को भी   बदल ही दे, भाग्य   देखकर,  हमारा बढ़ता हुआ “मनोबल” ॥

एक क्षण

हरा देते हैं ‘हालात’ इंसान को करके बेबस, एक क्षण में बेवजह,  लग जाती है जाने-अनजाने अंदरूनी चोटें   घाव दुखते है,  ‘तो ही दिखते हैं’,  दिन बीतते-बीतते   निशान भी ढूँढने ही पड़ते हैं । भरा रहता है उलझनों से दिमाग़  ‘राहत ही नहीं नसीब’ होती, किसी भी कोने में अजीब सी कश्मकश है,  दिल में  दिल में ही नहीं,   इस हवा में भी ‘घुल गई’ शायद, बदल गई है रिश्तों की तासीर भी  हवा के ‘बदलते रुख़’ की ही तरह, बहुत संजोकर रखें- तो भी फिसलते चले गए  रेत के जैसे मुट्ठी से,  धीरे धीरे निकल गए  थे ,जान से भी अज़ीज़ रिश्ते वो-  पलक झपकते  “एक क्षण में” हार गए जिनको ॥