एक क्षण

हरा देते हैं ‘हालात’

इंसान को करके बेबस, एक क्षण में बेवजह,

 लग जाती है जाने-अनजाने अंदरूनी चोटें 

 घाव दुखते है,  ‘तो ही दिखते हैं’,

 दिन बीतते-बीतते 

 निशान भी ढूँढने ही पड़ते हैं ।


भरा रहता है उलझनों से दिमाग़ 

‘राहत ही नहीं नसीब’ होती, किसी भी कोने में

अजीब सी कश्मकश है,  दिल में 

दिल में ही नहीं, 

 इस हवा में भी ‘घुल गई’ शायद,

बदल गई है रिश्तों की तासीर भी

 हवा के ‘बदलते रुख़’ की ही तरह,

बहुत संजोकर रखें-

तो भी फिसलते चले गए 

रेत के जैसे मुट्ठी से,  धीरे धीरे निकल गए 

थे ,जान से भी अज़ीज़ रिश्ते वो-

 पलक झपकते  “एक क्षण में” हार गए जिनको ॥

Comments

Popular posts from this blog

दहलीज़

हैप्पी लास्ट दिन

घर के दरवाज़े