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Showing posts from April, 2023

उसी मोड़ पर

                       बहुत सालो बाद मिले थे, आज हम । वह वैसी ही थी आज भी ।‘सब कुछ अपने अंदर ही समेटे हुए’ ।                  चेहरे पर वही लुका-छुपी खेलती हुई मुस्कान । बिना पुछे ही- ‘अब तो सब ठीक हो गया” ।  यह कहकर--  रागिनी एकदम चुप हो गई’ ।             वह जैसे अंदर से निकलने वाले शब्दों को रोक रही थी । “आज भी अपने ऊपर वैसा ही संयम था उसका” ।              फिर मैंने उसे घर का पता दिया, फ़ोन नंबर भी दिया । “मैंने कहा -  आना घर पर” ।      और उसने मुझे बिना देखे , आधा-अधूरा सुनकर  सिर्फ़  सिर हिला दिया ।     और फिर ,  नीचे सिर झुकाकर  उसी मोड़ की तरफ़ चल पड़ी ।  ‘जहाँ से अभी-अभी  आ...

उनकी असली ज़रूरत

               कबूतरों का समुह, उड-उड़कर  बार- बार बालकनी में बैठ रहा था ।  “एक चक्कर खुले आसमान की तरफ़ लगा कर आते” और फिर से,  वहीं बैठ जाते ।    “कभी नल के नीचे तो कभी मुंडेर पर” ।                  तभी नीचे से कुछ धीरे से कुरेदने की आवाज़ सुनाई दी । झुक कर देखा तो , ‘दीवार के कोने की ओट में’ एक कबूतर का जोड़ा था ।          “जो चोंच मार-मारकर गमले की मिट्टी कुरेद रहा था” । और गोल-गोल घूम कर,  भाग कर फिर से मुंडेर पर चढ़ जाता ।  “कुछ तो ढूँढ रहे थे”।   जैसे बहुत ज़्यादा ज़रूरी हो उनके लिए ।                    तभी थोड़ा सा पानी,  नल चलाते समय बहकर एक जगह  रुक सा गया ।  मैं कुछ काम से, मुड़कर पीछे हटी ही थी  कि “सारे कबूतर...

एक और बेचारी

                      हर रोज़ की तरह , आज फिर घर में शान्ति थी ।  और शमां अपने दोनों “बच्चों के साथ सहमी हुई बैठी हुई थी” ।         शराब में धुत्त  राजीव ने ज़ोर से दरवाज़े पर लात मारी ।           “उसने भी लपककर दरवाज़ा खोल दिया” और दिवार के साथ चिपक कर खड़ी हो गई  । राजीव ने अंदर पैर रखने से पहले ही गाली-गलौज शुरू कर दिया ।              एक के बाद एक “ऐसी शर्मनाक जो सीधे तीर की तरह सीने को भेद रही थी” । राजीव ने अपना सामान दरवाज़े पर ही  फेंक दिया और उल्टा-सीधा बोलता हुआ चारपाई पर लेट गया ।  बच्चे भी डरकर खड़े थे , “एक मुजरिम की तरह दरवाज़े की ओट में” ।             शमां भी डरी सहमी खड़ी थी ।क्योंकि कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता था ,जब उसके ऊपर हाथ ना उठाता हो । चुपचाप आगे पड़ी ...

डॉक्टर बनेगी मेरी बेटी

                  सर्वेश झुक-झुककर चला रहा था रिक्शा को । ऊपर तक सामान लाद रखा था, “ बस रिक्शा का हैंडल पकड़ने की जगह ही बचीं थी” । और तो और  बैठने की सीट तक पर  सामान था ।   पर, दिमाग़ था कि  शांत होने का नाम नहीं ले रहा था उसका, रह-रहकर “वही सब दिमाग़ में घूम रहा” था ।                  कल, घर जाकर रिक्शा खड़ा किया ही था कि छोटी भागती हुई आई । “नहीं मिल रही गुडडु कहीं भी”, पड़ोस में भी ढूंढ लिया , पास वाले मंदिर में भी देखकर आ गई । कहीं भंडारे में तो नहीं बैठ गई ।   सब  सुनते ही,  जैसे जान ही निकल गई ।  “एक तो लड़की ऊपर से ऐसा गंदा माहौल आज के  ज़माने का “।               पागलों के जैसे रिक्शा को छोड़कर “बिना चप्पलों के” ही, खुली गली की तरफ़ भाग लिया । वहाँ  चौपाल में बहुत से लोग  “...

खोखले रिश्ते

                  कल तक भी, उसे अपने ऊपर गर्व था कि “उसके तो चार-चार भाई” है । सभी एक से बढ़कर एक,धनवान और ख़ुशहाल ।पर आज जब उसको उनकी ज़रूरत थी तो भाई उसके आसपास भी नहीं आये ।    ”आख़िर लाखों  लग सकते थे” बहन के परिवार का इलाज करवाने में ।इसलिए अनजान बनकर बैठे थे ।            रेल दुर्घटना में हुए हत्या कांड में उसका अपना परिवार बुरी तरह घायल हो गया था । उसके इकलौते बेटे और पति की “अस्पताल में मौत से लुकाछुपी चल  रही थी” ।         और इधर वह भगवान से दुआएँ किए जा रही थी कि “कोई तो उसकी सहायता करे” । भगवान किसी को तो भेज दो    पर जहाँ भी गई वहीं से “ख़ाली झोली लिए” ही वापिस आ गई ।                  अब बस एक आस ही थी केवल अपने भाइयों से,”जिन्होंने उसकी तरफ़ देखना भी ज़रूरी नहीं समझा”...