उसी मोड़ पर
बहुत सालो बाद मिले थे, आज हम । वह वैसी ही थी आज भी ।‘सब कुछ अपने अंदर ही समेटे हुए’ । चेहरे पर वही लुका-छुपी खेलती हुई मुस्कान । बिना पुछे ही- ‘अब तो सब ठीक हो गया” । यह कहकर-- रागिनी एकदम चुप हो गई’ । वह जैसे अंदर से निकलने वाले शब्दों को रोक रही थी । “आज भी अपने ऊपर वैसा ही संयम था उसका” । फिर मैंने उसे घर का पता दिया, फ़ोन नंबर भी दिया । “मैंने कहा - आना घर पर” । और उसने मुझे बिना देखे , आधा-अधूरा सुनकर सिर्फ़ सिर हिला दिया । और फिर , नीचे सिर झुकाकर उसी मोड़ की तरफ़ चल पड़ी । ‘जहाँ से अभी-अभी आ...