डॉक्टर बनेगी मेरी बेटी
सर्वेश झुक-झुककर चला रहा था रिक्शा को । ऊपर तक सामान लाद रखा था, “ बस रिक्शा का हैंडल पकड़ने की जगह ही बचीं थी” । और तो और बैठने की सीट तक पर सामान था ।
पर, दिमाग़ था कि शांत होने का नाम नहीं ले रहा था उसका, रह-रहकर “वही सब दिमाग़ में घूम रहा” था ।
कल, घर जाकर रिक्शा खड़ा किया ही था कि छोटी भागती हुई आई । “नहीं मिल रही गुडडु कहीं भी”, पड़ोस में भी ढूंढ लिया , पास वाले मंदिर में भी देखकर आ गई । कहीं भंडारे में तो नहीं बैठ गई ।
सब सुनते ही, जैसे जान ही निकल गई । “एक तो लड़की ऊपर से ऐसा गंदा माहौल आज के ज़माने का “।
पागलों के जैसे रिक्शा को छोड़कर “बिना चप्पलों के” ही, खुली गली की तरफ़ भाग लिया । वहाँ चौपाल में बहुत से लोग “ताश खेलते हुए बैठे रहते थे” ।
नीचे-नीचे उनको घूरते हुए, देख-देखकर चलता रहा ।
“उनकी मंशा भाँपना चाह रहा था” एक डर-सा बैठ गया था , अपनी बेटी को लेकर , “कहीं कुछ ग़लत ना हो गया हो” जैसे हर दूसरे दिन सुनने को मिल रहा है ।
अचानक एक औरत की आवाज़ सुनायी दी ।” ये आपकी बेटी है क्या ?” आपको देखते ही पापा बोल रही है ।सर्वेश ने भागकर गुडडु को गले लगा लिया बहुत प्यार भी किया ।
फिर ग़ुस्से से डांटने लगा ,”साथ-साथ रोता भी जा रहा था” ।
वह औरत आंगनबाड़ी में एक अध्यापिका थी उसने बताया कि वह उनके पास सुबह ही आ गई थी ।
“बहुत ही ललक है पढ़ने की इसमें”, बड़ी होकर डॉक्टर बनना चाहती है ।
पहले तो भगवान को धन्यवाद किया कि “बेटी ठीक है” । फिर अध्यापिका का धन्यवाद किया और बेटी का हाथ पकड़कर, घर की तरफ़ तेज-तेज कदमों से चल पड़ा ।
रास्ते भर सोचता रहा “बहुत कमाना है अब मुझे । बेटी को तो पढ़ाऊँगा ही” ।
अचानक ही गाड़ी के हॉर्न से चौंक गया ,”पता ही नहीं चला उसे, कब सडक के बीचों-बीच पहुँच गया था”।
सब हॉर्न बजा कर उल्टा-सीधा सुना-सुनाकर जा रहे थे ।
पढ-लिख कर “डाक्टर बनेगी मेरी बेटी” ।उसको पढ़ाने के लिए दिन-रात महेनत करूँगा ।
अब जाकर, होंठों पर हल्की सी मुस्कान आई । फिर अपने हाथों से रिक्शा के हैंडल को मज़बूती से पकड़ लिया ।
गुनगुनाते हुए ज़ोर-ज़ोर से रिक्शा को खिंचने लगा ॥
Great 👍
ReplyDeleteIt’s gud to hard work to fulfill dreams 👍
ReplyDeleteSuper 👍
ReplyDeleteGreat
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