बंदोबस्त
दिनेश और कला ने “अपने लिए शायद कभी कुछ नहीं सोचा” ।बस बेटे का ही सोचा । उन्हें अपने ख़र्चे की तो ज़्यादा चिंता भी नहीं थी । “सब दिनेश की पेंशन से हो जाता था” । फिर एक दिन, विदेश गए बेटे ने बोल दिया - “नौकरी करने का दिल नहीं है उसका” । अब उसे बिज़नस शुरू करना है । उसके लिए पैसे चाहिए। पर उनके बेटे को ये दिखाई नहीं दे रहा था । “माँ बाप ने तो सारी कमाई ही उसके ऊपर लगा दी” । अब कहाँ से लायेंगे ? “वह जब भी फ़ोन करता , घूमा-फिराकर पैसे की ही माँग करता” । अब उनके बेटे की सुई, आकर मकान और ज़मीन पर टिक गई थी । बार-बार अपने पिता को बोलता रहता...