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Showing posts from June, 2023

बंदोबस्त

                  दिनेश और कला ने “अपने लिए शायद कभी कुछ नहीं सोचा” ।बस बेटे का ही सोचा । उन्हें अपने ख़र्चे की तो  ज़्यादा चिंता भी नहीं थी ।      “सब दिनेश की  पेंशन से हो जाता था” ।               फिर एक दिन, विदेश गए बेटे ने बोल दिया - “नौकरी करने का दिल नहीं है उसका” । अब उसे बिज़नस शुरू करना है । उसके   लिए पैसे चाहिए।             पर उनके बेटे को ये दिखाई नहीं दे रहा था । “माँ बाप ने तो सारी कमाई ही उसके ऊपर  लगा दी” । अब कहाँ से लायेंगे ?          “वह जब भी फ़ोन करता , घूमा-फिराकर पैसे की ही माँग करता” ।               अब उनके बेटे की सुई, आकर मकान और ज़मीन पर टिक गई थी । बार-बार  अपने पिता को बोलता रहता...

और कोई रास्ता भी तो नहीं था

                      मंदिर के बाहर सुबह से ही भीड़ थी । “गेट पर ही बहुत सारे स्टॉल लगे हुए थे” । किसी पर पुस्तक रखी हुई थी तो किसी पर  मंदिर सजाने वाला सामान ।      “लोग लाइन बना-बनाकर देखते हुए चल रहे थे” ।             ख़रीदने वाले भी बहुत लोग थे और देखकर आगे निकलने वाले भी बहुत ।       “भीड़ में ही एक बुज़ुर्ग भी धीरे धीरे चल रहा था” ।                कोई उनसे आगे निकल जाता तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता उनको । “कोई उनको पीछे सरका देता , तो भी कोई फ़र्क नहीं” ।          वह अपने हिसाब से ही देखते जा रहे थे ।  बस मंदिर के बड़े पुजारी का इंतज़ार कर रहे थे ।                ...

एक महीने बाद ही

                कल ही टिकट कटवाई है गाँव के लिए । चचेरी बहन की शादी है । अपना घर भी संभाल कर आना है । रिश्तेदारियों में  भी जाना पड़ेगा ।   मैडम जी—“एक ही बार जाने में सब काम हो  जाएँगे” ।            आज ही बता रहा हूँ —मैडम जी । “कल से  मेरी छुट्टी है , अब तो मैं एक महीने बाद ही आऊँगा” ।    “एक ही साँस में बिना रूके सब कुछ बताता चला गया” ।             साथ-साथ पौधों की मिट्टी भी ठीक करता रहा । गाँव के बारे  में सोचकर   अचानक ही  हँसना शुरू कर देता ।              अभी तो गया भी नहीं है । फिर भी इतना उत्साहित है ।” ऐसे व्याख्यान कर रहा था जैसे गाँव में ही बैठा है” ।              मेरे तीन बच्चे हैं ।  गाँव में अपन...

दुखी रहना समय की बर्बादी

                             मीना के घर की तरफ़ सब आते जाते घूर-घूरकर  निकलते थे । “बात करने पर लम्बा भाषण उसको सुनाकर जाते।”        बच्चे  बेक़ाबू हैं । इनकी अच्छी परवरिश नहीं की । “किसी का आदर लिहाज़ नहीं करते” ।        पता नहीं क्या- क्या और कौन-कौन, सुना जाता था ।  “जैसे सबकी साझी हो , सुनने और सुनाने के लिए” ।            उम्र के कुछ सालों में बहुत कुछ देख लिया था ।”बचपन, पढ़ाई, शादी, बच्चे और अब ये धीरे-धीरे सरकती ज़िंदगी” ।     पैसे की तंगी के बावजूद,जैसे तैसे बच्चों को पढ़ाया ।            पूरा परिवार ,यहाँ तक कि  गाँव भी उसकी बहुत इज़्ज़त करता था । “लेकिन अपने बच्चों को  अपने अनुरूप नहीं बना पाई”     ...

सूद से मूल प्यारा

                     सुहानी आज  तीन साल के बाद , अपने घर यानी माँ -बाप के घर आयी है ।           “पूरे घर को घूम-घूमकर ख़ुशी से देख रही”  ।  सब चीज़ों को  छू-छू कर चल रही ।  “ उसको लग रहा है जैसे कुछ बदला -बदला सा है” ।           दीवारों पर भी  नया रंग हो गया है शायद । फिर उसी दीवार की तरफ़ कदम  बढ़ा दिए , जहाँ पर सारे परिवार के सदस्यों की तस्वीरें लगी हुई है ।  “पर ये क्या ?  चौंक गई देखकर” ।            अब वहाँ उसकी कोई भी तस्वीर नहीं है । “कहाँ गई सब” ?           फिर भाग कर उस कमरे में गई , जो कभी उसका और उसकी छोटी बहन का होता था ।        “लेकिन यहाँ भी उसकी कोई भी तस्वीर, कोई सामान , कुछ भी तो नहीं था”...