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Showing posts from October, 2022

एहसानमंद

खिल उठे देखकर उन्हें पल भर में ही  शायद बरसों बाद हँसे होंगे यूँ खुलकर,  निकल गए कुछ रुके हुए, दबे हुए एहसास  हँसते ही रहे बेख़ौफ़ होकर । कितने ही ‘बहम’ पाल रखे थे मन में  माना सोच लिया  एक वक़्त,  ग़ैर लगने लगता है हर कोई  दिल ने माना तो, दिमाग़ ने भी हामी भर दी,  चलते रहे उसी ‘ढर्रे’ पर देखा समझा जो आँखों ने भी ।  मुस्कुराते ही नहीं  खुलकर खिलखिलाते भी थे हम कभी,  टटोली कुछ पुरानी तस्वीरें  कुछ पुराने क़िस्से याद करने को,  दिल किया आज भी ऐसे ही ‘हँसे खिलखिलाये’  और फिर हँसते ही रह गए देख-देखकर उनको । “एहसानमंद”  हो गए आज इन पुरानी तस्वीरों के ,  बरसों बाद वजह मिल ही गई ,   खुलकर हँसने की , मुस्कराने की ॥

कुदरत का रचा संगीत

बेजान ही पड़ गया मेरा बजता हुआ संगीत  जिसको बहुत चाव से, छाँटकर लगाया है मैंने , ये जोरो से बरसते पानी की बूँदे  नया ही गुनगुना रही है ,  कभी पत्तों पर, कभी दीवारों पर, टप टप करके  नया साज बजा रही है । बदहवास से फड़फड़ाते पेड़ पौधे  हवा के वश में हो गए हैं आज  छमछमाती बूँदे बार-बार बदल रही है राग, लहराता पानी ऊपर से कूद-फाँद करती बूँदें    पानी में भी, झूमते हुए ,विचरने लगे परिंदे ।  प्रसन्न हो गया मन भी   महसूस कर ये अनमोल लम्हे  जो मिल गए हैं आज,  बिना फ़रमाइश , “कुदरत का रचा संगीत” कमतर आँके भी तो कैसे  मिल गयी नई ताज़गी  नहीं रही उदासी की, अब कोई भी गुंजाईश  ।।

गुज़रता वक़्त

टहलते हुए या यूँ कहें   गोल गोल बग़ीचे की परिक्रमा जैसे चलते हुए   मिले कुछ यार आज भी , जो मिलते रहते हैं हमेशा से । कट रही है कैसी ज़िंदगी   सवाल पहला यही से  बारिस फिर बहुत सारे सवालों की , पूछते तो सभी है कैसी बसर कर रहे हो  कैसे कैसे गुज़ारता हूँ वक़्त ,  नही पुछता कोई भी   शायद लगता होगा सबको ही करनी ना पड़ जाए तुम्हे  ही कुछ मदद चुप रहकर, पीछे हट जाते होंगे इसलिए भी । हँसता भी हूँ मन ही मन उनकी सुनके कैसे गुज़ारता हूँ —- मेरे सिवाय किसी को भी सरोकार नहीं , अपनी दुनिया अपने समझौते  जी-भर  बसर कर भी रहे हैं  ख़ुशी से,    ये “गुज़रता वक़्त” है तसल्ली रखिए जनाब                मुड़कर वापस  तो आएगा ही नहीं ।।

फिर अगले बरस

बहुत रौनक़ और ख़ुशनुमा माहौल रहा  सब के मन में उत्साह और शरीर में जोश रहा  बिना थके ही पूरा-पूरा दिन झूमते ही रहे  शायद ‘आशीर्वाद था माँ का’ सब पे   दर्द भी इसलिए ही ख़ामोश रहा । ना चाहते हुए भी थिरकते रहे क़दम  ना छोटे बड़े ना ही जाति-पाति का कोई वहम  सब एक जैसे ही थे पंडाल के अंदर, गरीमा थी शायद उन पवित्र हवाओं की  रम से गए थे सभी , थी  ‘अद्भुत शक्ति’ उन्हीं झोंकों की । क्या अब से ना कोई झंकार होगी ? ना तालियों की आवाज़ और ‘ढोल की थाप’ होगी  ‘मॉं’  पंडाल ख़ाली करके चली है हमारा  अब तो “फिर अगले बरस” पर ही आस होगी  ।।                     🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼