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Showing posts from July, 2022

मौसम की अदा

 दिन निकलते ही, था कुछ अलग-अलग सा  गरजते बरसते आसमाँ ने ‘रंग जमा दिया’,  दरख़्तों के तने डूब गए गहरे पानी में  आज बादलों ने, सारा ध्यान यहीं लगा दिया । घुटने तक उठाकर कपड़े, उतरे गहरे पानी में  कभी गिरते, कभी उठते, मचलते हुए , खिलखिलाते हुए उस दरिया में दौड़ते रहे , देखते-देखते तैरकर गई चप्पल भी दूर तक       होते रहे लोट-पोट उसको जाती देखकर । टहनियों से निकलती, छोटी छोटी पत्तियाँ  जड़ों से बाहर निकले ,कुछ नए पौधे, महसूस करते हुए अपनी पहली बारिश को        नहा रहे थे जैसे, बूंदों में ‘मदहोश से होकर’ ।   मोरों ने नाच-नाचकर  बादलों को कुछ ऐसे रिझाया  होकर मजबूर बदलना ही पड़ा, अपना रूख,  दिल है प्रफुल्लित, देख “मौसम की अदा”      लग रहा है अब, सब बदला बदला सा ।।

अक्खड़

अपना ही वजूद  जब भी तलाशने लगे है, कभी  ‘खुलकर’ आना ही पड़ा, ज़माने के सामने, होता ही गया, सब उसूलों का        ‘लेखा-जोखा’ भी,फिर तो । बनाये कुछ उसूल- दायरा भी बनाया उनका , था ही नहीं, जो गिनती में  उसको भी रख लिया ‘मन मारकर’,  डिगने नहीं दिया आत्मविश्वास कभी          चलते रहे सिर उठाकर उम्र भर । है तो ‘अक्खड़’- शायद ,  बहुतों को लगता भी होगा , करते ही नहीं कभी, खुलकर व्याख्यान अपना ‘उसूल’  जो ख़ुद, खुद के लिए बनाए थे कभी  रहे है हमेशा से  ‘कट्टर बनकर’ ही  रोक देते है अब भी,  बहकते हुए क़दम ,       हम जैसे “अक्खड़” के,  पीछे खींचकर   ।।

सीने से लगाकर

पानी ‘आँखों में’ दिखते ही,  चेहरा ही घुमा लिया  दहलीज़ पार करते-करते ख़ुद को समझा लिया,  एक बसेरा था ये कुछ सालों के लिए   ‘ढूंढ दिया’ है अब नया,     सोचकर, आगे कदम बढ़ा दिया । दिल हल्का किया है  सीने से लगाकर परिवार ने,   ‘बरसती हुई आँखों ने’समझा दिये          रीति-रिवाज भी सलीक़े से , चली जा रही है, वो भर कर पिटारा  अपनी अठखेलियों का ,रुसवाई ,मनाई का    और छोड़ें जा रही है, गुलिस्ताँ अपनी यादों का ।  हो सकता है वो ‘महल बड़ा हो’ इस घर से  घर में रहने वाले भी मिल जाए ‘अपने से’,   नया नहीं है  कुछ भी-  चल ही रहा है ये, इस जहां में ‘सदियों से’ । ख़्वाहिश यही बस-  रच बस जाएं, जाकर नए संसार में , ‘काश’  मिल जाएं वहाँ भी, “सीने से लगाकर”   अपनेपन का एहसास करवाने वाले,                         नये घर-परि...

मुस्कुराती हुई तस्वीर

उम्र बहुत कुछ सिखाती रहती है  हर पड़ाव पर अलग तजुर्बा, अलग एहसास ।  कभी कभी हो जाती है, ‘ज़िद्द सी’ मन में  नहीं रूकना ,कर ही गुज़रना है                नामुमकिन भी आज ।   अंदर तो चलती रहती है  उथल-पुथल, दिलोदिमाग़ में भी , सुकून  है ही कहाँ ? ‘ दो राही’ हो जाती है डगर भी चलते-चलते  नहीं चुन पाते, सही वक़्त पर सही दिशा । छिपा क्या अंतर्मन में  किसी को दिखता ही तो नहीं ,  तस्वीर तो आती ही है,  हमेशा ही मुस्कुराती हुई ।   ‘परछाई सी’ हो गई हैं ख़ुशियाँ   धूप छांव का खेल-सा खेलती हुई  टुकड़े-टुकड़े है भीतर तो मन बाहर से हँसता मुस्कुराता चेहरा । नहीं दिख रहा, अंदर का उमड़ता तूफ़ान   बस दिख रही है तो ,   “मुस्कुराती हुई तस्वीर”  ही  ।।

मन का ग़ुबार

 मन का ग़ुबार  नहीं देखा निकलते, सरेआम बेक़ाबू होते , पता नहीं  कितने ही, राज है उसके सीने में । है तो इन्सान ही पर-  वह  तो स्तम्भ है घर का , नहीं है ‘इजाज़त छलकने की’ उन्हें   जो समुंदर भरा है उसकी आँखों में । बहुत बार चलें होंगे  बेताब लफ़्ज़,  होंठों से निकलने को, नहीं कहा खुलकर ,अपना हाल कहीं बैठकर ।  उमड़े भी होंगे बार-बार, जज़्बात दिल के,  बाँटने को किसी ‘अपने के साथ’,      खुलकर गले लग-कर । एक मुस्कुराहट से  पूरा घर हँसता है उसकी, नींव है वह घर की तो- डगमगाने की गुंजाइश ही नहीं । बेबसी कहें या ज़िम्मेदारी ,रखना ही है रोककर, “मन का ग़ुबार” दफ़नता आ रहा है   और दफनता ही रहेगा ,     यूँ ही  दिल के ही भीतर  ।।