मुस्कुराती हुई तस्वीर
उम्र बहुत कुछ सिखाती रहती है
हर पड़ाव पर अलग तजुर्बा, अलग एहसास ।
कभी कभी हो जाती है, ‘ज़िद्द सी’ मन में
नहीं रूकना ,कर ही गुज़रना है
नामुमकिन भी आज ।
अंदर तो चलती रहती है
उथल-पुथल, दिलोदिमाग़ में भी ,
सुकून है ही कहाँ ?
‘ दो राही’ हो जाती है डगर भी चलते-चलते
नहीं चुन पाते, सही वक़्त पर सही दिशा ।
छिपा क्या अंतर्मन में
किसी को दिखता ही तो नहीं ,
तस्वीर तो आती ही है,
हमेशा ही मुस्कुराती हुई ।
‘परछाई सी’ हो गई हैं ख़ुशियाँ
धूप छांव का खेल-सा खेलती हुई
टुकड़े-टुकड़े है भीतर तो मन
बाहर से हँसता मुस्कुराता चेहरा ।
नहीं दिख रहा, अंदर का उमड़ता तूफ़ान
बस दिख रही है तो ,
“मुस्कुराती हुई तस्वीर” ही ।।
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