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Showing posts from April, 2022

ख़ामोशी

गुफ़्तगू  की है आज ,रात की ख़ामोशी से  रात तो तारों वाली ही है ,पर चमक थोड़ी फीकी है,  यूँ तो चाँदनी भी फैल रही है थोड़ा थोड़ा करके  घूमते बादलों ने आसमाँ पर ,ज़रा सी छाप छोड़ी है ।  ख़ुशी और सुकून देने वाले है ये पल  पक्षी भी सो रहे ,पेड़ों ने भी चादर ओढ़ ली है ,  बतिया रहे है चाँद तारे भी, जैसे फ़ुरसत में  हवा के लिए आज ‘चहलक़दमी’ ही काफी है । ‘शब्द’  ढूंढ रही हूँ लिखने के लिए  जो ‘बखान’ कर सकें इस ख़ूबसूरती का , आँखें देखना चाह रही है, चुपचाप बैठ कर  दिल तो बस, महसूस करने में ही ‘राज़ी’ हैं । चुप रहकर ‘बहुत कुछ’ कहे जा रही                         यह  बितती रात की “ख़ामोशी” है ।।

अदाकार

लगता है कभी कभी रंगमंच है ज़िंदगी                  करने पड़ते हैं बहुत से ‘किरदार’बारी बारी से। बेहतरीन करते करते रह जाती हैं ख़ामियाँ अक्सर                 उम्मीदें तो बहुतों को है हम जैसे अदाकारों से । बेवजह भी राह चलते हुए मिलते हैं बहुत से लोग                कुछ सिखा जाते बातों से, तो कुछ सबक से। चेहरे पर नहीं आते भाव मन की गहराई के                 डूबना पड़ता है तह तक इनको निभाने के लिए।  रहते हैं मुखौटा लगाकर स्वाभिमान पीछे छोड़ के             नचाती है दुनिया फँसाकर,अलग अलग क़िस्सों में ।  समय भी उनका होता है कहानी भी होती हैं उनकी            ...

छूट गया

न चाहते हुए भी छूट गया था छूट गई गाँव की गोद, लाचारी में  रह गया भाईचारा भी वहीं इस महामारी में  ढूँढा बहुत नहीं मिला वो सुकून,बाहर भी जाकर                  जो जाते जाते ,मेरे गाँव ही छूट गया था ।  नहीं मिली कहीं मिट्टी पानी की सोंधी सी ख़ुशबू  वो चुल्हे के ‘रोटी साग’ का बेहतरीन स्वाद  पकते हुए दूध की न भूलने वाली, मलाई की मिठास  तपतपाती गर्मी के दिन, ऊपर पड़ती सूर्य की तपन   प्यास बुझाने को था बस ,वो गहरा कुआँ                       जो जाते जाते,मेरे गाँव ही छूट गया था । तलहटी में पहुँचा रहता था जिसका पानी  बारिश के दिनों में बढ़ता ,वो भी आधा अधूरा  जो नहीं पहुँच पाया कभी किनारे तक, चाह कर भी   झाँक कर कुएँ में पलटकर गूंजती आवाज़ें  मन को उत्साहित करने वाला पंछियों का शोर           ...

आँखें माँ की

अपनी उम्मीदों की गठरी को बाँध कर  बच्चों की खुशियों को बना कर मक़सद              हिम्मत करके तय कर गई लम्बा सफ़र । “सपने”  सजाये हुए हैं माँ की आँखें ने  मुड़ी-तुडी पर्ची पर ,लिखे है ढेर सारे   कुछ हो गए पूरे, कुछ अभी बाक़ी है रूके न कुछ भी ,आये ना कोई अड़चन                  बस चलता रहे यूँ ही सब उम्र-भर । बना रही है सपनों को गूँथके लड़ियाँ  कोई छोटी ,कोई बड़ी भी है उनमें  पर गाँठ मज़बूत लगी है सबमें           खुल ना जाए कभी,नज़रें टीकी है उन्हीं पर । कुछ अलग सी, चमक रही है “आँखे माँ की” प्यार और विश्वास दोनों ही लबालब है इनमें             उमड़ रही हैं दुआएँ उनमें झोली भर-भरकर  ।।            

ज़रूरी तो नहीं

 मन शांत तो घर ही मंदिर जैसा  मन अशांत तो मंदिर भी कुछ नहीं  अकेले रहो या भीड़ में  क़दर खुदकी नहीं की, तो ख़ुशी कहीं भी नहीं  सब आपका भला ही सोचें,  ज़रूरी तो नहीं । कोई ज़रूरी तो नहीं—  हम ज़िद पर अड़ जाए तो मनचाहा ही मिले  हम सबसे अलग दिखे और ध्यान हम से ना हटे खींच कर ‘बढ़ती भीड़’ से ख़ुद को  तुम्हारा मन मुताबिक़ करना  पसंद आये सबको ये ज़रूरी तो नहीं । चुनिंदा ही रखना ख़्वाहिशें अपनी  नहीं मनाता कोई अब तो ,रूठना भी नहीं  हर कोई आपका हितैषी हो  ज़रूरी तो नहीं । खटकते होंगें  कईयों की आँखों में  तुम भी ‘अनचाहे’ की तरह  सब  सिर-आँखों पर रखें तुम्हें  “ज़रूरी तो नहीं” ।।

हादसे

बेवजह ज़िंदगी में जगह बना लेते हैं   बिना आहट किये सब उलट-पुलट जाते हैं  कुछ हादसे वक़्त बदलते ज़रूर है पर,  बदला हुआ वक़्त ख़ुद,  एक हादसा बन जाता है ।  रात भी नयीं आती है,  ख़्वाब भी नया आता है   बीती हुई यादों का झोंका  हवा जैसे आता-जाता रहता है ।  ज़िंदगी कम पड़ जाती हैं  दुनियादारी समझने के लिए  कभी समझा नहीं पाते तो , कभी समझ भी नहीं आता है । हल्की सी मुस्कुराहट लबों पर  छोटी सी माफ़ी से सब सम्बल भी जाता है ।                         “हादसे”  भी ज़रूरी है ज़िंदगी में                                       अपने-पराए दिखाते हैं              ...

ज़िंदगी की किताब

 एक-एक पेज पलट कर रोज़मर्रा का    खट्टे-मीठे अनुभवों से निकलते हुए  ज़िंदगी की किताब को एक ‘नया कवर’ चढ़ाकर  सीखते-सिखाते माहौल में रमकर  मुड़े हुए पेजों को सीधा किया फिर दबाकर । कोशिश भी की पेजों को सलीक़े से लगाकर  फैलने भी नहीं दी  ‘स्याही’ अक्षरों के ऊपर  भूले-बिसरे को भी समेटा लकीरों में सजाकर । अभी बहुत पन्ने ख़ाली है  बहुत क़िस्से भी बाक़ी है  बाक़ी हैं सुख-दुःख को गूँथना भी, माँजा लगाकर  ।  बढ़ता जा रहा है पन्नों का बोझ भी इस पर   मोती से अक्षरों से रखना है इसको सजाकर बरकरार हैं उम्मीदे अब भी ,”ज़िंदगी की किताब”  पर ।।

दोबारा

रह जाती हैं ख्वाहिशें अधूरी बहुत सी,                 फिसलने लगती हैं मुट्ठी से ,ढीला छोड़ते ही  कोशिश तो करते छूटते हुए को,  पकड़ने की कस के ,        पर-‘दोबारा’ पाने की होती ख़ुशी ,हाथों मे आने पर ही । एक एक लम्हे से ज़िंदगी सँवर जाती है  हार मिलने के बाद भी  नई शुरुआत इंतज़ार कर रही होती है , नहीं होता सब कुछ ख़त्म , किसी का भी  पड़ता है जब जीना, हर हाल में सबको ही , कुछ जज़्बात दफ़न करके तो  कुछ सपने नये बुनकर    खड़ी करनी पड़ती है ज़िंदगी फिर ‘दोबारा’ भी  अपने ख़ाली पन्नों को रंग बिरंगी यादों से भरते रहना                 “ ज़िंदगी बहुत क़ीमती है”                 करवाना एहसास ख़ुद को ‘दोबारा’ भी ।।

जुगलबंदी

टहलते हुए जंगल में   उस अकल्पनीय दृश्य ने खींचा ध्यान मेरा  मोर कोयल संग ,इकट्ठे होकर परिंदे  जंगल में घूम-घूमकर शोर मचा रहे ,   फिर भीनी भीनी ख़ुशबू महसूस हुई  नज़रें ऊपर उठी और क़दम बढ़ते चले गए , जंगल में गुलमोहर के पेड़ों पर  फूल आ रहे हैं झोली भर-भर के  गिर गई पत्तियाँ वृक्षों से रंग बिरंगे फूल टहनियों पर सज गए ,  लाल ,गुलाबी ,जामुनी, नीला ,पीला  पूरे जंगल का ही तो रूप बदल गए , कोयल ने भी शोर मचाकर मोहर लगायी है  ‘राजा पेड़ आम’ की नयें फलो से शाखाएँ भर आयी है , पक्षियों ने कर जुगलबंदी महफ़िल सजाई हैं  पेड़ों की शाखाओं  पर कूद कूदकर कोयल ने तो  नई फ़सलों की  ‘बधाइयाँ ‘ भी गाईं  है । आज  परिंदों और झूमते पेड़ों की “जुगलबंदी” में  वक़्त  बिताना लगभग  सार्थक  हो गया  इस अद्भुत नज़ारे से मन का कोना-कोना  नई स्फूर्ति भर कर प्रफुल्लित हो गया  ।।

जादू सी झलक

तरस जाते हैं लबों पर मुस्कान लाने के लिए  ढूंढते हैं नए नए  बहाने मन रिझाने के लिए   वजह तलाशते है ‘ज़बर्दस्ती’ खिलखिलाने की   परेशान  कर लेते हैं ख़ुद को ही   हल्की सी झलक पाने के लिए । झलक   ‘मुस्कुराहट की झलक ‘ उन चमकती हुई आँखों में दिखी  टपकता पसीना ,आत्म विश्वास भरे चेहरे में दिखी  थक हार कर भी खिलखिलाते हुए ,  हाथ पर ही रोटी चटनी खाते हुए में दिखी   जो मिला उसी में रह-रहे संतुष्ट में दिखी   चेहरे पर बढ़ती झुर्रियां ना रिश्तेदार ना साथी ,  दूसरों को ख़ुश देखकर ख़ुश रहने वालों में दिखी  उस बेख़ौफ़ बेपरवाह  बचपन में दिखी  अपने ‘काम से काम’ रखने वाले लोगों में दिखी ।                 जिसको ढूंढ रहे बाहर भटक भटककर                 महसूस किया मन को थोड़ा शांत करके           ...

मुक़ाम

 सुबह उठते ही मन में चल पड़ती है जद्दोजहद   आज वो करना  ही है जो रह गया था कल,               नहीं सोचना क्यों बुरा हुआ था  बिते हुए दिन                आगे बढ़ना है  नहीं रूकने देना अपने कदम  ।                 अब तो हासिल करना है वो ,  मुक़ाम ही                 राहो  में आयेंगी उलझने   सरल कुछ भी नहीं         ‘ कोशिश नहीं रोकनी ‘  मिलेगी मुसीबतें बेहिसाब ही । अपनी मदद ख़ुद करेंगे तभी साथ  दूसरे भी देंगे आगे बढ़कर नहीं पकड़ेंगे तो ,हाथों से छूट जाएगा ही ।                कोई सीढ़ियाँ दिखाएगा तो कोई रास्ता बताएगा  ...

चारदीवारी

“चारदीवारी”   कहते हैं घुटता है दम इसमें रहकर  ना बाहर की दुनिया का एहसास, ना रहतीं सुधबुध   अबूझ पहेली ही बन गई ज़िंदगी इसमें उलझ कर । महसूस किया उनकी इस   दुविधा को  ज़िंदगी रुक जाती ही होगी , तन्हा से बैठकर ।  वैसे ‘बहुत ही ख़ूबसूरत’ है   ये दुनियाँ   उदासी को हावी न होने दें, ख़ुद को रूला कर ढूँढते रहो वजह गुनगुनाने की, टालो ना बहाना बनाकर,  वादा ख़ुद से करों रूकना नहीं,खोजनी है खुशियाँ  ख़ाली पोस्टर जैसी ज़िंदगी, रंगों से भरनी है मुस्कुराकर ।  बदल डालो परिभाषा चारदीवारी  की तलब जगाओ  कुछ नया करने की  बदतर नहीं बनने देना ,बनानी है अब तो बेहतर ,  घर को ही अपना  रंग-मंच बना लो   सलीक़े से तराश लो खुद को ,मत समझो कमतर । रच दो कुछ अलग सा “चारदीवारी” का स्वरूप  हिम्मत जुटा कर ,कदम बढ़ा कर    ख़ुश रहने की नई-नई वजह तलाश कर ।।

वह जर्जर

 घने गहरे दरख्तों के बीच, उदास और मायूस , जर्जर हालत में सूखा हुआ, फिर भी खड़ा सीना ताने  वृक्षों को फलों से लदा देख, गुमशुम  सा सोच रहा है । पंछियों की चहचहाहट भी वही हुआ करती है   जहाँ फलतीं शाखाओं  पर फूल पत्ते मुस्कुराते हैं  नई नई आ रही पत्तियों को चुन चुन कर खाते हैं , आने जाने वाले भी रूक जाते, हरे-भरे वृक्ष को देख   थकावट उतारने के लिए वहीं बैठ कर सुस्ताते हैं । सूखते वृक्ष का फूल पत्तियां भी साथ छोड़ते जा रही  बाजूओं सी टहनियाँ भी छिटक कर गिर गई  झुक गया ‘कमर सा तना’ जिसके सहारे था खड़ा हुआ , सब देखकर हैरान नहीं है “जर्जर होता वृक्ष” ‘धैर्य रख कर’  होते जा रहे बदलाव को  बिना दुःखी हुए सहन करता हुआ,  प्रकृति के जीवन-मरण चक्रव्यूह को   ‘ बस ‘     मौन होकर देख रहा है ।।                     ————-

गॉंठ सबक की

आता है एक समय  सबकी ज़िंदगी में  गुज़रना ही पड़ता है अनचाहे दौर से , न चाहते हुए भी कुछ समझौते पड़ते हैं करने आकर किसी पड़ाव पर गाँठ बाँधनीं पड़ती है कसके । अपने मन की उथल-पुथल को रखते हैं क़ाबू  खोल ना दे  “किताब”, दिमाग़ कभी यूँही कहीं जाके , बिना वक़्त देखें बह ना जाए जज़्बात दिल से निकलकर   सबक ना दे जाये बेक़ाबू ज़ुबान ही फिसल के । तुफान आते रहते हैं ज़िंदगी में  बदल देते हैं सब कुछ   तबाह हो जाते है ‘पूरे के पूरे कुनबे’ एक ग़लत फ़ैसले से , ज़िंदगी के हर दिन हर मोड़ पर  मिलते हैं सबक़  कुछ छप  जाते हैं दिमाग़ में तो कुछ मिट भी जाते   तो बाँध लेते हैं” गाँठ सबक की” जीना है अगर सुकून से ।।