चारदीवारी

“चारदीवारी”   कहते हैं घुटता है दम इसमें रहकर 

ना बाहर की दुनिया का एहसास, ना रहतीं सुधबुध

  अबूझ पहेली ही बन गई ज़िंदगी इसमें उलझ कर ।

महसूस किया उनकी इस   दुविधा को 

ज़िंदगी रुक जाती ही होगी , तन्हा से बैठकर ।

 वैसे ‘बहुत ही ख़ूबसूरत’ है   ये दुनियाँ 

 उदासी को हावी न होने दें, ख़ुद को रूला कर

ढूँढते रहो वजह गुनगुनाने की, टालो ना बहाना बनाकर,

 वादा ख़ुद से करों रूकना नहीं,खोजनी है खुशियाँ

 ख़ाली पोस्टर जैसी ज़िंदगी, रंगों से भरनी है मुस्कुराकर ।

 बदल डालो परिभाषा चारदीवारी  की

तलब जगाओ  कुछ नया करने की

 बदतर नहीं बनने देना ,बनानी है अब तो बेहतर ,

 घर को ही अपना  रंग-मंच बना लो

  सलीक़े से तराश लो खुद को ,मत समझो कमतर ।

रच दो कुछ अलग सा “चारदीवारी” का स्वरूप 

हिम्मत जुटा कर ,कदम बढ़ा कर 

  ख़ुश रहने की नई-नई वजह तलाश कर ।।

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

दहलीज़

हैप्पी लास्ट दिन

घर के दरवाज़े