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त्योहार तो हमारा भी है

                            कैलाश को बहुत दिनों से इंतज़ार था  इस दिन का ।  “नया साल शुरू होते ही , दिन गिनने शुरू कर दिए थे” ।      धर्मशाला में कहाँ पर बैठना , यह भी पहले ही सोच रखा था ।      “हर-रोज़ एक चक्कर , उस  गली में पक्का लगाकर ही आता था” ।आने-जाने का रास्ता वहीं बना दिया था ।                      कैलाश का इंतज़ार आज ख़त्म हो गया । “सुबह होने की बेसब्री साफ़-साफ़ दिखाई दे रही थी” । आँखें खुलते ही नहा धोकर तैयार हो गया ।      “मीना के उठने से पहले ही अपने बेटे रोहित को भी उठा लिया” ।                       उसको भी नहला कर तैयार कर लिया । जैसे ही म...