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Showing posts from September, 2022

वो चंद लफ़्ज़

सुनने को तरस गए  वो चंद लफ़्ज़ ‘तुतलाती ज़ुबान को’ जो सिखाये थे कभी , बार-बार दोहराकर रटवाते  थे जिनको  गूंजते तो रहते हैं अब भी कानों में   पर ,   पास से तो सुनते नहीं । देखा था जाते हुए , दहलीज़ पार करते हुए   हाथ भी हिलायें थे ज़ोरों से मुस्कुराकर विदा करते हुए ,  था एतबार,  वक़्त पर मगर  यूँ ही आते-जाते मिलते रहेंगे,    साल में तो एक आध-बार । ढूंढ रही है ये आँखें भी नीरस होकर  ‘हाथ जा रहा है’ बार-बार आँखों पर, क्या रुकेगा ?  कोई वाहन अचानक से आकर  अब भी खुल जाती है ‘आधी-अधूरी नींद’,   गली में कुछ शोर होने पर । बुझा बुझा है दिल, कान भी ‘गए है तरस’ “वो चंद लफ़्ज़”  सुनने को  बस,   बस एक बार बोले तो वो आकर…… ।।

शुक्रिया ख़ुदा

एक चारपाई,  जो दरख़्तों के नीचे थी लगायी  ‘ईट पत्थरों की मुंडेर’ बनाकर  झोपड़ी भी बनायी, चार लकड़ी खड़ी करके  था कपड़ा भी लगाया   पक्का काम करके, उसको ‘स्नानघर’ था बनाया । नहीं हुआ थोड़ा सा भी एहसास, हो सकता है ये भी  उड़ गया सब   सामने ही आँखों के, भरसे मेघा आँधी तूफ़ान के साथ   गरजते हुए    रह गए सब देखते,  खड़े-खड़े ‘बदहवास’ होके । तैरती जा रही थी पानी में उनकी चारपाई  उजड़ गई वो कुटिया, जो ‘महल जैसी थी बनायी रह गई बस, एक ‘कपड़े टांगने वाली’ लंबी सी रस्सी    जो थी एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक, खींच कर बंधी ।  चल पड़े बचा-खुचा सम्मान उठाकर  फिर से ढूँढने  एक अनजान डगर , अब भी हाथ जोड़ कर ,बोल रहे  “शुक्रिया खुदा”     कृपया आपकी, जान तो महफ़ूज़ है हम सबकी ।।                           🙏🏼🙏🏼

झिलमिलाती ओस की बूँद

चाँद की शीतलता में ‘नई नई पैदा हुई’ चमकती हुई रोशनी में,  झिलमिलाती हुई  तय है ‘अंत होना है’  भोर होते-होते ही  फिर भी संतुष्ट सी मुस्कुरा रही थी , वो ओस की बूँद, उपस्थिति दर्ज करवा रही थी । ‘बिखरी हुई लंबी’ ज़िंदगी की इच्छा नहीं  चंद लम्हों में ही मक़सद पूरा कर कर लेगी ,  हज़ारों आँखों को संतुष्ट कर, प्रसन्नता देकर   सिमटने से पहले ही ,  मुस्कुराने की वजह दे जायेगी । हवा से ‘हिलते हुए पत्ते ने’ भी  फ़र्ज़ बख़ूबी निभाया,  नहीं बिखरने दिया समय से पहले उस-  “झिलमिलाती ओस  की बूँद” को, जी गई थोड़े समय में ही ,अपना ‘सार्थक जीवन’ ,  और,   मुस्कुराकर देखे जा रही है  अब,                          ख़त्म होते हुए अपने ही अस्तित्व को ……।।

ख़ुशियों की तिजोरी

किन शब्दों में पिरोऊँ  उनके छलकते जज़्बातों को , गोद में लेकर झूमते हुए, घुमते रहे दिन भर  छोटे छोटे हाथ, पलक झपकाती ‘गोल गोल आंखें,’  कर रही थी पहचान सबकी,  हौले हौले मुस्कुराकर । बहुत तड़पे  फिर भी ना मिल पायी थी, ये ख़ुशी  चक्कर भी काटे, अनाथालय और मंदिरों के ‘तरस ही रहे थे’ इस ख़ुशी के लिए, एक लंबे अरसे से ।  फटेहाल चादर में, खिलती कली ‘कुम्हलाई सी’ कौन है  किसकी ‘गोद से फिसल’ कर आई है  गोद किसकी सूनी हुई, किस मजबूरी में ठुकराईं है  तरस रही आँखों ने तो आगे बढ़कर,  दिल से अपनाई है ।  रौशन करने आयी है उनके जीवन को घर के कोने कोने को, जगमगा रही ‘बन के जुगनु’   ‘दिये की रोशनी सी’ बनकर, घर-आंगन में आज,                         “ख़ुशियों की तिजोरी” आई है ।।

पत्र आया ज़िंदगी को

तर-बतर करती बारिश, ‘रोम-रोम जगाती’ हवा  हो रहा है सब तरोताज़ा, झूम रहा मन, बार बार झाँक रहा है सूरज भी आकर ‘तार पर लटकती’ हुई बूंदों को, इंद्रधनुष बनाकर । शायद इस ‘ख़ुशनुमा मौसम’ ने ही  ज़िंदगी को पत्र भिजवाया है, महक जाओ, चहक लो,उन्मुक्त परिंदे बनके, ‘भर लो नई स्फूर्ति’ से ख़ुद को  जगमगाने लगो चमकती किरणों के ही जैसे । देर से ही सही, अब आ गई- ढूंढते हुए ज़िंदगी,  हमारा भी पता  बहुत इंतज़ार किया, अब जाके ‘पत्र आया ज़िंदगी को”, ‘जी-भर जी लेते हैं अब, ये कुदरत से मिले पल संजो भी लेते हैं, सब यादें बनाकर ‘अब उठ जाओ’,भिजवा दिया है ये संदेश,                     अपने सोये अंतर्मन तक ।।