वो चंद लफ़्ज़
सुनने को तरस गए वो चंद लफ़्ज़ ‘तुतलाती ज़ुबान को’ जो सिखाये थे कभी , बार-बार दोहराकर रटवाते थे जिनको गूंजते तो रहते हैं अब भी कानों में पर , पास से तो सुनते नहीं । देखा था जाते हुए , दहलीज़ पार करते हुए हाथ भी हिलायें थे ज़ोरों से मुस्कुराकर विदा करते हुए , था एतबार, वक़्त पर मगर यूँ ही आते-जाते मिलते रहेंगे, साल में तो एक आध-बार । ढूंढ रही है ये आँखें भी नीरस होकर ‘हाथ जा रहा है’ बार-बार आँखों पर, क्या रुकेगा ? कोई वाहन अचानक से आकर अब भी खुल जाती है ‘आधी-अधूरी नींद’, गली में कुछ शोर होने पर । बुझा बुझा है दिल, कान भी ‘गए है तरस’ “वो चंद लफ़्ज़” सुनने को बस, बस एक बार बोले तो वो आकर…… ।।