झिलमिलाती ओस की बूँद

चाँद की शीतलता में ‘नई नई पैदा हुई’

चमकती हुई रोशनी में,  झिलमिलाती हुई 

तय है ‘अंत होना है’  भोर होते-होते ही

 फिर भी संतुष्ट सी मुस्कुरा रही थी ,

वो ओस की बूँद, उपस्थिति दर्ज करवा रही थी ।


‘बिखरी हुई लंबी’ ज़िंदगी की इच्छा नहीं 

चंद लम्हों में ही मक़सद पूरा कर कर लेगी ,

 हज़ारों आँखों को संतुष्ट कर, प्रसन्नता देकर 

 सिमटने से पहले ही ,  मुस्कुराने की वजह दे जायेगी ।


हवा से ‘हिलते हुए पत्ते ने’ भी 

फ़र्ज़ बख़ूबी निभाया,

 नहीं बिखरने दिया समय से पहले उस-

 “झिलमिलाती ओस  की बूँद” को,

जी गई थोड़े समय में ही ,अपना ‘सार्थक जीवन’ ,

 और,   मुस्कुराकर देखे जा रही है  अब,                        

 ख़त्म होते हुए अपने ही अस्तित्व को ……।।

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