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Showing posts from May, 2023

बड़ा समझौता

                   रेणु  घर के आगे वाली सड़क पर  सुबह-शाम बार-बार  चक्कर लगाती रहती थी । इसीलिए  कभी सफ़ाई वाला, कभी कूड़े वाला , “कोई न कोई मिलता ही रहता उन्हें ” ।    रेणु सबके साथ बोलती थी । हाल-चाल भी पूछती ।        कोई तीज-त्योहार होता तो “उनको बोलती -  घर से आकर थोड़ा सामान ले जाना”  ।          सबको रेणु की ,उनके घर की ,पहचान हो गई थी । “ कई दिन नहीं दिखती तो गली के गार्ड से पूछते उनके बारे में” । एक बार हमें भी मिले चलते-चलते ।         मैंने उनसे पूछा -   कैसे समय व्यतीत करते हो । उनको  शब्द नहीं मिले, खुलकर बताने के लिए  ।    “बस समझाना चाह रही थी कि अकेली नहीं हूँ” ।               “काम वाली के साथ सारा दिन घर में ही रहती हूँ...

भंडारे वाली गाड़ी

             बड़ी गली के बीच में ही भंडारे वाली गाड़ी खड़ी करवा दी थी ।             और सब आस-पास वालों को घर-घर जाकर संदेश भी भेज दिया था ।  कुछेक को फ़ोन करके भी  बता दिया था कि “आज भंडारे में ही खाना सब आकर” ।           रंग-बिरंगी सी क़मीज़ पहनकर छोटा सा बच्चा बार-बार “छुपकर देख रहा था , लाइन लगी या नहीं “।      उसे भी तो खाना था वहीं पर जाकर ।              ज्यों ही लाइन लगनी शुरू हुई “झट से भागकर नंगे पैर ही, सबसे आगे खड़ा हो गया” ।          बड़ी सी थाली भी उठा ली हाथ में । जैसे सब बोल रहे थे, वही सब कुछ डलवाता रहा थाली में । “उसकी थाली ही दिख रही थी  डालने वाले को,  वह नहीं” ।      क्योंकि गाड़ी में ऊपर बैठकर डाल रहे थे । “उसका कद काफ...

स्वार्थ का तमग़ा

              रोमा के घर के बाहर लोगों की मिली-जुली बातें सुनने को मिल रही थी । कोई बोल रहा था - “बेचारी  रोमा” ।     कोई बोल रहा था- “बहुत स्वार्थी थी” ।बिना काम के कभी उसने बात नहीं की ।              “लोगों की नज़रों में स्वार्थी थी रोमा” ।  पर सही  मायने में हालातों ने उसे  बदल दिया था ।        किससे,  कब ,किस तरीक़े से बात करनी है । “बहुत ही सोच-समझ कर चलती थी” ।       अगर दिल करता तो,कभी कभी अपनी ज़िंदगी से जुड़ी कुछ बातें बाँट लेती थी ।            “पंद्रह-सोलह साल की उम्र में ही ब्याह हो गया था” उसका । दूर के रिश्तेदार ऐसे ही आये, “उसको पसंद करके  अपनाकर चले गये” ।            दिन बीतते देर नहीं लगी । शादी करके  कुछ दिनों ब...

छोटे सिपाही की शानदार जीत

                  वह दस- ग्यारह साल का लड़का ही था शायद । “जो गाड़ियों के रूकते ही  भाग कर जाता था” । फिर गाड़ी साफ़ करने वाले, कपड़े बेचना शुरू कर देता ।    ‘‘कपड़े को ज़ोर ज़ोर से रगड़ कर, उसका असर दिखाता’’ ।                खिड़की पर हाथों से इशारा करके बेचने की कोशिश करता था । ‘‘कुछ ख़रीद कर जाते कुछ अपना मुँह, दूसरी तरफ़ फेर  लेते’’ ।     हर रोज़ ज़्यादातर उसको  यही करते हुए देख रही थी ।                अचानक दो तीन दिन बाद ध्यान गया  कि” वह लड़का कहीं नज़र ही नहीं आ रहा” ।    पीछे मुड़कर दूसरी गाड़ियों को भी देखा , “कहीं तो खड़ा होगा” ।           “उसकी मासूम सी शक्ल और  उम्मीद से भरी आँखें “, मेरी आँखों के आगे घूमने लगी । इत...