बड़ा समझौता
रेणु घर के आगे वाली सड़क पर सुबह-शाम बार-बार चक्कर लगाती रहती थी । इसीलिए कभी सफ़ाई वाला, कभी कूड़े वाला , “कोई न कोई मिलता ही रहता उन्हें ” । रेणु सबके साथ बोलती थी । हाल-चाल भी पूछती । कोई तीज-त्योहार होता तो “उनको बोलती - घर से आकर थोड़ा सामान ले जाना” । सबको रेणु की ,उनके घर की ,पहचान हो गई थी । “ कई दिन नहीं दिखती तो गली के गार्ड से पूछते उनके बारे में” । एक बार हमें भी मिले चलते-चलते । मैंने उनसे पूछा - कैसे समय व्यतीत करते हो । उनको शब्द नहीं मिले, खुलकर बताने के लिए । “बस समझाना चाह रही थी कि अकेली नहीं हूँ” । “काम वाली के साथ सारा दिन घर में ही रहती हूँ...