थोड़ी देर के लिए
इतना तो सोचा ही नहीं था कि सर्दियों में भी मॉनसून जैसी बारिश हो सकती है । “इस साल तो झड़ भी ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा” । कल रात ही तो आंगन और दुकान की सफ़ाई की थी । “सुबह उठते फिर वैसा का वैसा” । सारे लोग शायद घरों के बाहर ही खड़े थे। क्योंकि शोर बहुत आ रहा था । “बच्चों के हंसने चीखने की आवाजें भी आ रही थी” । पहले तो लगा -पता नहीं क्या ही हो गया होगा । लेकिन साथ वालों की आवाज़ें भी सुनी । “फिर खाट से जैसे-तैसे उठकर दरवाज़ा ...