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Showing posts from March, 2023

दिल से इज़्ज़त

                  आज फिर से,  उन्हीं के बारे में सोच रही थी।कुछ रिश्ते ऐसे भी होते है जिन्हें भगवान ने पहले से ही बना रखा होता है और उनका आपसी प्यार बेशक़ीमती होता है जिसकी कोई मिसाल नहीं मिलती ।          ये बेमिसाल प्यार उनका,जिन्हें ‘‘सौतेली माँ और सौतेली बेटी’’ में बाँटा गया। वह बहुत ही छोटी थी जब उसकी माँ का देहान्त हो गया।  वह बेसहारा तो नहीं थी  पर “उसे माँ की कमी खलती थी”। बच्चों को माँ की गोद में बैठे देखती तो, उसको भी उम्मीद रहती ।    आख़िर भगवान ने उसकी सुन ली  और ‘‘उसकी भी ज़िंदगी में माँ आ गई”।               पहले तो  “झिझक के कारण”  उनके पास  नहीं जाना चाहती थी, पर धीरे -धीरे प्यार पनपता चला गया ‘‘और अब उसे भी  माँ मिल गई’’। फूलों के साथ कांटे भी पीछे कयूं  रहने लगे।आख़िर मोहल्ले की एक-दो औरतों ने मिलकर दोनों के बी...

बैरी हो गया चाँद

 पहली बार नहीं  बहुत बार सजे देखा है उसको  आज कुछ ‘अलग ही रूप’ निखरा है , चटक रंग  साड़ी,  रंगबिरंगी चुडियां  माँग सिन्दूर भरी, माथे पर ‘सोने का टिका’ है । होले-होले  मुस्कुरा रही है   मेहंदी  को भी बार-बार निहार रही है ,  ‘दूर देश’ गया है साजन उसका   दिल में पास होने का एहसास जगा रही है ।  बैरी चाँद भी आएगा  धीरे-धीरे देर करके  ‘कब ले जाएगा संदेश’  उस दूर देश  में , देख रही है आसमान को   बेचैन सी होकर  गया कहाँ चाँद आज,  ‘चाँदनी को समेटकर’ । शायद तारे भी ‘गुहार लगा रहे’ है   टिमटिमा रहे है साथ में  थाली सजी देख पूजा की , हाथ में  आज तो “बैरी हो गया चाँद” भी, उसके लिए                 तरस गई है आंखें भी इंतज़ार में ।।

ये मन ही बावला है

दामन ना ही छूटे  उम्मीदों का तो ही ठीक,  रह रह कर ही सही  लौटती तो रहती है ‘रोशनी सी बनकर’ ,  ये ‘बावला मन’ ही तो जगाता रहता है  उनको भी  ठहर-ठहरकर । प्यासा सा बन  ढूँढता रहता है पानी इधर-उधर  ‘सूखे कुएँ’ में भी झांकता है बार बार, होता है पता,  ये उसको   नहीं मिलेगा वहाँ भी जाकर । नहीं तोड़ना चाहता  पनपते हुए ख़्वाब अपने,    करके बैठ गया है अब तो  पतझड़ में भी ‘कोपलों की उम्मीद’ ।   शायद नहीं समझना चाहता हक़ीक़त  ‘मरुस्थल से’ भी फूलों की आस रखता है , “ये मन ही बावला है” नही डरता ‘शूल’ पैरों के नीचे आने से  झाड़ियों से भी सहारे की चाह रखता है ।।

अपनों की तलाश

 आज  बहुत बार क़लम उठायी  संजोना चाह रही थी उन हसीन पलों को   बोलते हुए से अक्षरों में लपेटकर ,  जो साथ बिताये थे हँसते हँसाते  कुछ ही समय पहले, अपने परिजनों संग । लेकिन  नही पता क्यों, नहीं लिख पा रही   बार बार उस उस औरत पर  जा रहा था ध्यान,  पेड़ के नीचे बैठी घूरे जा रही थी  आने जाने वालों को  पढ रही थी  सबके चेहरे  गहनता से टकटकी लगाकर , शायद बिछड़े हुए अपनों की, थी उसे तलाश  तरस रही थी, थी गले लगाने को आतुर । सामान   दोनों हाथों से ऊपर उठा, लगातार हिलाकर  मुस्कुरा भी जाती थी, बीच बीच में थोड़ा थोड़ा  कुछ याद करके गाना सा, गुनगुना  रही थी , अनजान राहें थी सारी, उसके लिए तो   बैठ जीती थी सुबह ही आकर,  इन्हीं कपड़ों में,  ठीक इसी जगह ,  उन बूढ़ी आँखों में “अपनों की तलाश”          नहीं पता,   कब से ही जारी थी ॥