ये मन ही बावला है

दामन ना ही छूटे 

उम्मीदों का तो ही ठीक,

 रह रह कर ही सही 

लौटती तो रहती है ‘रोशनी सी बनकर’ ,

 ये ‘बावला मन’ ही तो जगाता रहता है 

उनको भी  ठहर-ठहरकर ।


प्यासा सा बन

 ढूँढता रहता है पानी इधर-उधर 

‘सूखे कुएँ’ में भी झांकता है बार बार,

होता है पता,  ये उसको 

 नहीं मिलेगा वहाँ भी जाकर ।


नहीं तोड़ना चाहता 

पनपते हुए ख़्वाब अपने, 

  करके बैठ गया है अब तो 

पतझड़ में भी ‘कोपलों की उम्मीद’ ।


  शायद नहीं समझना चाहता हक़ीक़त 

‘मरुस्थल से’ भी फूलों की आस रखता है ,

“ये मन ही बावला है”

नही डरता ‘शूल’ पैरों के नीचे आने से 

झाड़ियों से भी सहारे की चाह रखता है ।।




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