नई पहचान
रंजना माँ के साथ हर-रोज़ सुबह ही उठ जाती थी । “उनके साथ पहले घर का काम निपटवाती , फिर स्कूल चली जाती”। “अपनी माँ को हमेशा बोलती थी —माँ तुम देखना मैं एक नई पहचान बनाऊँगी” । उसकी माँ अनिता तो सुबह ही काम पर निकल जाती थी । “फिर वह पाँच-छह कोठियां कर के ही घर आती थी” । “इसलिए रात तक ही आ पाती थी”। ठीक-ठाक कमा लेती थी । अपने और बेटी के लिए । आज शाम जब घर आयी तो कुछ ज़्यादा ही थकी हुई थी । रंजना ने पूछा —माँ क्या हुआ । “आप तो बीमार जैसे लग रहे हो” । कुछ नहीं । काम की ही थकावट है बस । रातभर सो करौ सुबह तक ठीक हो जाऊँगी ...