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Showing posts from May, 2022

लिखूँ कुछ ऐसा

सोचा है  कुछ नया, कुछ अलग सा लिख दूँ  अच्छी लगे सबको  ऐसी नई रचना कर दूँ , दुरुस्त क़लम को भी किया ,तराशा है थोड़ा सा  चलते रहना ‘हाथ थाम’ कर, आज मेरे लफ्जों का  लिखना है कुछ ऐसा जो ,उतर जाए सबके ही ज़हन में  ।  ‘शब्द जो- गिरते हुए को उठा दें ,लड़खड़ाते को सँभाल लें  दिलासा दे कमज़ोर को  और रोते हुए को हंसा दे ,  पढ़ते जिनको दिलासा मिले , टूटते हुए दिल को  बढ़ जाये स्वाभिमान ,ऐसा उन ‘शब्दों का निचोड़’ हो  लिखूँ कुछ ऐसा ,उन शब्दों पर सबकी ही कमान हो ।  ‘जाग उठे- सोया हुआ ज़मीर ,उन शब्दों की खनखनाहट से   मर्यादा में रखना मेरे लफ़्ज़ों को ,विनती की है भगवान से ,  मिल जाए शब्दों को साथ ‘क़लम जैसी पतवार’ का “लिखूँ कुछ ऐसा”  खिल जाए .बगिया सी शब्दों की                                       महका दे जीवन सबका   ।।

उड़ा लो साथ

पिंजरे में बैठा,  देख रहा आसमाँ को ,बेबस नज़रों से   उड़ते पंछियों में जगा रहा है जोश ‘थोड़ा और उड़ो’   आज तो छूके  ही आना,  उन्मुक्त गगन को ,  आ-जाना थोड़ी देर ,मेरे घर की मुँडेर पर भी, बाँटना चाहता हूँ सुख दुःख, बुला रहा हूँ सबको ही । पंख तो मेरे भी हैं,  दिल भी कर रहा है खुले में उड़ने के लिए ,  कूद-फाँद करने के लिए , ऊँची उड़ान भरने के लिए , ज़िंदगी ऐसे ही गुजरेगी,मजबूर हूँ पिंजरे में रहने को  कुछ पल ही आ-जाओ ,दिखाऊँ दिनचर्या तुमको ।  दाना-पानी तो है, मेरे पिंजरे में भी है सजाया हुआ पर नहीं है वो आज़ादी जो ,  तुम जी रहे , जी रहे बेफिक्र रहकर , उड़ रहे बेपरवाह होकर  करवा दो मुझे भी आज़ाद, तोड़ दो पिंजरे को , “उड़ा लो साथ” अपने,  इस कैद से रिहा करवाकर ।।

दिवार की ओट

देखे जा रही दीवार के पीछे से, ख़ुद को छिपाकर  कुछ डरी हुई, कुछ सहमी हुई सी,  बेचैनी भरी हुई थीं आँखों में , उदासी ठहरी हुई थी चेहरे पर  उम्मीद थी मुझसे बेशक, ताकें जा रही थी रुक रुककर । दीवार की ओट लेकर ही समझा रही थी  अपने चेहरे से कोई कहानी बयां भी कर रही थी , एक पैर भी नहीं सरका रही ,जैसे’ गढ़ गए थे’ ज़मीन पर  बिना बोले ही अपने सवालों के जवाब भी चाह रही थी ।  छुपीं हुई सी आशा थी उसकी आँखों में , बोहोत कुछ चाहती होगी कहना,आगे बढ़कर                           शायद परिस्थितियों रोक रही थी । मुस्कुराईं मैं भी हल्के से,कर दूँ थोड़ा निश्चिंत  बढ़ा रही हूँ हाथ मदद के लिए, दे दूँ थोड़ी सी हिम्मत ,  “दीवार की ओट” से ही ताकती रही ,वो मासूम ठिठककर, पर,आई तो सही मुस्कुराहट थोड़ी सी ,                         ...

लौट-आ शहर अपने

               ये मोहल्ला ,गलियां , आपस में बतला रहे हैं  उस बड़े शहर में ऐसा क्या मिला, जो यहाँ नहीं है, जज़्बात रौंदें ,रिश्ते तोड़ें ,  तोड़ दिया भाईचारा  सुकून नहीं मिला था यहाँ ‘फिर’ मिला तो वहाँ भी नहीं है । तक़दीर तो ऊपरवाला ही लिखता है सबकी  जितना लिख दिया क़िस्मत में, मिलेगा तो उतना ही, खोजबीन थी तो ,  ‘कौन सी ख़ुशियाँ की’  जो वहाँ मिल रही थी,  और यहाँ थी नहीं ।  दायरा ही तो बढ़ाया तुमने, ‘बेमतलब’ की इच्छाओ का ना ज़िंदगी ने अहसान किया,ना ही मुसीबतों ने लिहाज़ , आ अब  “लौट-आ शहर अपने” , समेट ले ख़ुशियाँ ही   लगा लें गले ,  उसी सुकून को जो  छूट गया था यहीं  अब भी मिलेगा अपनी बाँहें फैलाकर                                         जो वहाँ मिला भी नह...

गुमराह बादल

छँटते जा रहे हैं रूठकर ,शायद  रफ़्तार नहीं पकडी, सरक रहे आहिस्ता से  जा रहे गुनगुनाते हुए, हवा संग मचलते हुए   बरसेंगे कही तो जाकर, काली घटा-सी बनकर ।  छिटक गए हैं एक-एक करके  आसमान को ख़ाली करते हुए  रोशनी में चमचमा उठा आसमाँ भी  काले बादलों की ‘चादर सी’  उतार कर । सूर्य की तपिश कहाँ ही कम है  बादलों ने रोकी हुई थी, बाहें पसार कर  दिल कर रहा पकड़ कर , जाल ही डाल दें , पर, कर ही दिया है इनको हवा ने ‘गुमराह’   जो भागे ही जा रहे है आसमान छोड़कर  ।  अभी भी ठहरे अटके हुए से है ,कुछ बादल दामन नहीं छोड़ना चाह रहे है आसमाँ का ‘मचलती हवा’ तो अब भी बाज नहीं आ रही, दिखने लगे बेबस ,अब तो ये “गुमराह बादल”                                  पर, लिए जा रही है सबको , आगे-आगे भगाकर  ।।

सपना भी बड़ा हो गया

 बचपन में एक सपना  आता था बार बार  उड़ता था बिना पंख वाला जहाज़ ,इधर उधर  नींद और सपने में तालमेल भी, था ज़बरदस्त ,  नींद टूटते, सपने वाला जहाज़ भी जाता था रुक,  वो छोटी सी मुंडेर पर रुकता था आकर  घुमाकर पूरे मोहल्ले में ,वहीं जाता था उतार कर  । टूटने नहीं देते थे हम भी नींद अपनी  पकड़े रखते थे अपने सपने की डोरी  कोशिश बहुत करते आए अब भी, वही सपना , लौट जाऊँ बचपन में महसूस करूँ वही सब असलियत में नहीं तो  नींद में ही सही  । शायद मेरी तरह वो “सपना भी बड़ा हो गया” है इस दुनियादारी के झमेले में फँस चुका है ,  आती ही नहीं है अब वो पहले वाली नींद  ऐसे सपने आना ही अब तो ख़्वाब बन चुका है ।।

वही टहनी

वही था बिस्तर ,वहीं था आशियाना  चहकते फिरते रहते हैं सारे जहां में  घूम घूमकर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर  घरौंदा एक ही बनाया था आते थे वहीं मुड़कर  और सो जाते अपने ‘परो’ को थोड़ा सिकोड़कर  । वही पतली सी टहनी ,नाज़ुक से पत्ते  झूलती रहती थी उनके साथ  कूद-फाँद के  बाट जोहोती रहती वो भी, उनके दूर जाते ही  निहारती रहती उनको  खेलते हुए,  दूर से  । उड़ जाएंगे एक दिन ,बड़े होने के बाद  नया घरौंदा बनाएंगे नए साथियों के साथ  आएंगे भूले भटके इधर भी, कभी तो  ढूंढेंगे फिर “वही टहनी”  पीछे छोड़ गए थे जो  थोड़ा सा मचलकर  लगायेंगे गले,                अपने ‘परों’ को फैला-फैलाकर  ।।

थोड़ा सा

माँगा है खुदा से थोड़ा सा वक़्त और  रह गया है कुछ, ज़रूरी करने के लिए , बीते हुए लम्हों से भी गुज़ारिश की है मैंने           चलना साथ थोड़ा,रुक-रुककर मेरे लिए । ज़िम्मेदारियाँ तो बहुत बचीं हैं अब भी  धीरे-धीरे चलकर ही सही  जारी हैं पहुँचने की कोशिश फिर भी,                       उस आख़िरी पड़ाव के लिए ।  बिना बोले,बिना बताए ही ,निकल गए  देखते देखते हाथों से ,कुछ अज़ीज़ रिश्ते, नामुमकिन है लौट कर आना ,उनका अब         ज़रूरत थी जिनकी मुझे, ताउम्र के लिए । ज़्यादा कुछ तो नहीं माँगा   माँगा है वक़्त और  “थोड़ा सा” ‘अब जीकर देख ले हम भी ज़रा सा , बचें हुए लम्हों को, सिर्फ़ और सिर्फ़                              ...

कल फिर आयेगा

आज फिर निकल चुकी थी रेलगाड़ी  उनके सपनों की गठरी को लिये जा रही थी  नंगे पैरों से भागकर ,सडक आज भी मापी थी ,  कल की तरह सब दोहराया, बेमन-सा होकर  ढोहता रहा सामान, बनके स्टेशन पर कुली  दिमाग़ में घूम ही रही थी, ‘क़िल्लत’  पैसों की  । बिटिया आज फिर पूछेगी, लायें क्या नई ड्रेस  बेटा भी हाथों को देखता रहेगा   घूर घूर कर ,  कल रात वायदे कर दिये थे, परिवार को बैठाकर   फिर से बहकाने होंगे ,कोई नया बहाना ढूंढ कर । ख़ाली हो चुका था रेलवे-स्टेशन ,  पसरा हुआ था सन्नाटा, बस उसको छोड़कर  साथ दे रहे थे वो, शोर करते हुए कबूतर , ‘उम्मीद मत छोड़ना’, समझा रहे थे शायद  “ कल फिर आएगा”  आ जाना,                             नयीं आशायें लेकर ।।

विजयी भव

मेरी मंज़िल को भी नहीं भनक  तय हुआ कैसे रास्ता ,वहाँ पहुँचने तक  गुमराह किया ,मज़ाक़ ‘हालातों’ का उड़ाया    बिना बुलाए बहुतो ने,वक़्त-बेवक्त आकर   ।  ख़ुश तो बहुत हुए होंगे, उजाड़ कर हमें  खुश तो हम भी हुए ,उनकी असलियत जानकर  मुश्किल हो सकता है ,ख़ुद को फिर से खड़ा करना पर बांध ली है मज़बूत रस्सी, उम्मीदों की खींचकर ।  बुलंद  होते जाएँगे अब तो हौसले  रुकने तो देंगे ही नहीं अब  मंज़िल भी अपनी, सफ़र भी अपना  फिर थक जायगी, तक़दीर भी रूठकर । दे देते हैं ख़ुद को ही ‘शुभकामनाएं’   “विजयी भव” ,अब नहीं हटना पीछे  साँस सुकून की लेनी है बस अब                   आख़िरी पड़ाव पहुँचकर ।।

ख़ास शब्द

लिखा है बहुत से विषयों पर, बहुत बार  मैंने  बिना ढूंढें शब्द अपने आप आते रहते हैं हाथों में , देखे बिना उठाया, क़लम ने भी उनको हमेशा                  पिरोया एक-एक लाइनों के धागों में । नहीं मिल रहे वो “ख़ास शब्द” लिखना था कुछ मैंने  आज टटोला भी बहुत, शब्दों के भंडार को                        जो अक्सर रहते हैं मेरे ज़हन में । क़लम ने ही नहीं ,शब्दों ने भी मान लिया   जितना लिखोगे ,उतना कम ही पड़ेगा उनके लिए  सच ही लग रहा है आज मुझे भी                    शब्द बने ही नहीं, ‘मेरी माँ’ के लिए । इतनी ‘जान’  ही नहीं ,मेरी क़लम की स्याही में   जो लिख सके कुछ ‘दमदार’ उनकी तारीफ़ में , दुनिया में अब तक नहीं बने ,शायद  वो “ख़ास शब्द” जिनकी रचना ही हुई हो ...

बेरंग तस्वीर

बेचैन होता था दिल ,जिन पलों को याद करके  बढ़ आए आगे उनसे , थोड़ी फरियाद करके  भर लिए आशाओं  के रंग, सहज सहज फैलाकर  बदल रहीं ज़िंदगी की बेरंग तस्वीर ,                                 हौले से मुस्कुराकर । ऐसा नहीं कि कभी कोशिश की नहीं बढ़ने की  पर शायद कोई सडक बनी ही नहीं थी मेरे लिए, लू के थपेड़ों से धक्के लगते रहे ज़िंदगी भर ,  ना लोग बाज़ आए तकलीफ़ें देने से यूँ ही  ना हमने ही हिम्मत दिखाई कभी ,                                   सम्बल जाने की ।  चमकने लगी आँखे भी आत्मविश्वास आने से जगा लिया ख़ुद को हमने, ‘ख़ुद से ही लड़कर’ , बदल कर रंगत ,सड़क अपने लिए संवारी ली बदल देंगे अब क़िस्मत ज़िंदगी की,     ...

रूबरू

होकर देखना रूबरू कभी, अपने अंतर्मन से  बहुत से सवालों के मिल जायेगें जवाब , सुलझेंगी बुरी तरह फँसी ,बहुत सी दुविधाएँ  गाँठें खुलनीं शुरू होंगी  काफ़ी उलझनो की ।                 साफ़ कर लेना चिपके हुए  जालों को हाथों से खींचकर गहरी जमी परत ,धूल की हटा लेना मन से  एक-एक दिन का  हिसाब करके देखना  कोई वक़्त  बेहतर तो कोई बदतर  पूरी किताब ही खुलेगी ज़िंदगी की । जो दिन कल आना है,  पकड़ लेना आगे बढ़ उसको फैलाकर  दोनों बाँहें अपनी , वक़्त बुरा ही सही, बित ही गया जब  उस पर अब ,समय गवाना नहीं । कितनी ही आशाओं के,पलटते पन्नों का  शोर  गूंज रहा हैं जीवन में  कभी “रूबरू” होकर ,ख़ुद से       कोशिश करना   सुनने की  ।।

मजबूर ज़ुबान

मज़बूरी कहूँ या बेबसी, जो  दिखी उनकी आँखों में फिर से ,  बहुत कुछ था लबों,पर कहने को उनके   शायद नहीं दिया ज़ुबान ने साथ । ज़ुबान ने नहीं दिया साथ तो,  झलक ही गया चेहरे पर  छुपाने की कोशिश भी की , मुँह फेर कर इधर उधर कुछ तो लाचारगी थी उनके मन में  कह भी नहीं पाए तो, छुपा भी नहीं पाये  ज़ुबान ने भी नहीं होने दिया बेपर्दा ,                आज ज़माने के सामने ।   कर रहे है या अपने आप हो रहा है  सब दफ़न दिल के तहख़ाने में , नहीं होने दी छेड़खानी ,अपने उसूलों से  नहीं गिरने दिया “मज़बूर ज़ुबान” ने भी         होंठों पर ‘ताला’ लगा लिया अपने ।।                        

हक़ीक़त

दिखा ही दिया आइना वक़्त ने , आत्मसात करवाया हक़ीक़त से  बदनाम हूँ मैं बदलने के लिए, पर  मुझसे ज़्यादा तो यहाँ लोग बदलते हैं । दिखता हूँ मैं, महसूस होता हूं, बदलता हुआ  लोग तो पीठ मोड़ने का,मौक़ा भी नहीं देते हैं । यक़ीन ना हों तो करके देखना कभी, एक बार तो यक़ीन   विश्वास की ओट में छुप-छुपकर, वार अपने ही करते हैं । अच्छा भी वक़्त, बुरा भी वक़्त , सब कुछ क्या वक़्त ही करता है  कोसते हैं वक़्त को मिलकर सारे  “हक़ीक़त”  में  धधकती मशालें                      ख़ुद लिए फिरते हैं ।।