मजबूर ज़ुबान

मज़बूरी कहूँ या बेबसी, जो

 दिखी उनकी आँखों में फिर से ,

 बहुत कुछ था लबों,पर कहने को उनके 

 शायद नहीं दिया ज़ुबान ने साथ ।

ज़ुबान ने नहीं दिया साथ तो, 

झलक ही गया चेहरे पर 

छुपाने की कोशिश भी की ,

मुँह फेर कर इधर उधर

कुछ तो लाचारगी थी उनके मन में

 कह भी नहीं पाए तो, छुपा भी नहीं पाये 

ज़ुबान ने भी नहीं होने दिया बेपर्दा ,

               आज ज़माने के सामने ।

 

कर रहे है या अपने आप हो रहा है 

सब दफ़न दिल के तहख़ाने में ,

नहीं होने दी छेड़खानी ,अपने उसूलों से 

नहीं गिरने दिया “मज़बूर ज़ुबान” ने भी 

       होंठों पर ‘ताला’ लगा लिया अपने ।।

                     

 


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