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कथा का असली अर्थ

                     उनको तो  पता ही नहीं था । किसने  यह सब व्यवस्था की थी धार्मिक कथा ज्ञान की” । बस एक बड़ा सा पंडाल लगते  हुए देख लिया था ।       सबके लिए बैठने का बंदोबस्त भी बढ़िया किया गया  था ।       “कोई भी आ सकता था” । किसी को भी अंदर जाने से नहीं रोक रहे थे ।     “जो जानता भी नहीं उसको भी आदर सम्मान से बिठा रहे थे” ।                            “ उसमें कुछ तो अपना समय व्यतीत करने आये थे । जो सोच रहे थे कि  घर बैठकर दिवार ही तो देखनी है” ।      अच्छा है थोड़ा रौनक में बैठकर जाएंगे ।                    “एक-आधा  संगत म...