सपना भी बड़ा हो गया
बचपन में एक सपना आता था बार बार
उड़ता था बिना पंख वाला जहाज़ ,इधर उधर
नींद और सपने में तालमेल भी, था ज़बरदस्त ,
नींद टूटते, सपने वाला जहाज़ भी जाता था रुक,
वो छोटी सी मुंडेर पर रुकता था आकर
घुमाकर पूरे मोहल्ले में ,वहीं जाता था उतार कर ।
टूटने नहीं देते थे हम भी नींद अपनी
पकड़े रखते थे अपने सपने की डोरी
कोशिश बहुत करते आए अब भी, वही सपना ,
लौट जाऊँ बचपन में महसूस करूँ वही सब
असलियत में नहीं तो नींद में ही सही ।
शायद मेरी तरह वो “सपना भी बड़ा हो गया” है
इस दुनियादारी के झमेले में फँस चुका है ,
आती ही नहीं है अब वो पहले वाली नींद
ऐसे सपने आना ही अब तो ख़्वाब बन चुका है ।।
Well said!
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