वही टहनी

वही था बिस्तर ,वहीं था आशियाना 

चहकते फिरते रहते हैं सारे जहां में 

घूम घूमकर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर 

घरौंदा एक ही बनाया था आते थे वहीं मुड़कर 

और सो जाते अपने ‘परो’ को थोड़ा सिकोड़कर  ।


वही पतली सी टहनी ,नाज़ुक से पत्ते 

झूलती रहती थी उनके साथ  कूद-फाँद के

 बाट जोहोती रहती वो भी, उनके दूर जाते ही 

निहारती रहती उनको  खेलते हुए,  दूर से  ।


उड़ जाएंगे एक दिन ,बड़े होने के बाद

 नया घरौंदा बनाएंगे नए साथियों के साथ 

आएंगे भूले भटके इधर भी, कभी तो 

ढूंढेंगे फिर “वही टहनी”  पीछे छोड़ गए थे जो 

थोड़ा सा मचलकर  लगायेंगे गले, 

              अपने ‘परों’ को फैला-फैलाकर  ।।


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