लौट-आ शहर अपने

              

ये मोहल्ला ,गलियां , आपस में बतला रहे हैं 

उस बड़े शहर में ऐसा क्या मिला, जो यहाँ नहीं है,

जज़्बात रौंदें ,रिश्ते तोड़ें ,  तोड़ दिया भाईचारा 

सुकून नहीं मिला था यहाँ ‘फिर’ मिला तो वहाँ भी नहीं है ।


तक़दीर तो ऊपरवाला ही लिखता है सबकी

 जितना लिख दिया क़िस्मत में, मिलेगा तो उतना ही,

खोजबीन थी तो ,  ‘कौन सी ख़ुशियाँ की’ 

जो वहाँ मिल रही थी,  और यहाँ थी नहीं ।


 दायरा ही तो बढ़ाया तुमने, ‘बेमतलब’ की इच्छाओ का

ना ज़िंदगी ने अहसान किया,ना ही मुसीबतों ने लिहाज़ ,

आ अब  “लौट-आ शहर अपने” , समेट ले ख़ुशियाँ ही 

 लगा लें गले ,  उसी सुकून को जो  छूट गया था यहीं 

अब भी मिलेगा अपनी बाँहें फैलाकर 

                                       जो वहाँ मिला भी नहीं ।।


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