कल फिर आयेगा

आज फिर निकल चुकी थी रेलगाड़ी

 उनके सपनों की गठरी को लिये जा रही थी

 नंगे पैरों से भागकर ,सडक आज भी मापी थी ,

 कल की तरह सब दोहराया, बेमन-सा होकर

 ढोहता रहा सामान, बनके स्टेशन पर कुली 

दिमाग़ में घूम ही रही थी, ‘क़िल्लत’  पैसों की  ।


बिटिया आज फिर पूछेगी, लायें क्या नई ड्रेस 

बेटा भी हाथों को देखता रहेगा   घूर घूर कर ,

 कल रात वायदे कर दिये थे, परिवार को बैठाकर 

 फिर से बहकाने होंगे ,कोई नया बहाना ढूंढ कर ।


ख़ाली हो चुका था रेलवे-स्टेशन ,

 पसरा हुआ था सन्नाटा, बस उसको छोड़कर

 साथ दे रहे थे वो, शोर करते हुए कबूतर ,

‘उम्मीद मत छोड़ना’, समझा रहे थे शायद 

“ कल फिर आएगा”  आ जाना,

                            नयीं आशायें लेकर ।।

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