गुमराह बादल

छँटते जा रहे हैं रूठकर ,शायद 

रफ़्तार नहीं पकडी, सरक रहे आहिस्ता से 

जा रहे गुनगुनाते हुए, हवा संग मचलते हुए 

 बरसेंगे कही तो जाकर, काली घटा-सी बनकर ।


 छिटक गए हैं एक-एक करके 

आसमान को ख़ाली करते हुए 

रोशनी में चमचमा उठा आसमाँ भी

 काले बादलों की ‘चादर सी’  उतार कर ।


सूर्य की तपिश कहाँ ही कम है

 बादलों ने रोकी हुई थी, बाहें पसार कर

 दिल कर रहा पकड़ कर , जाल ही डाल दें ,

पर, कर ही दिया है इनको हवा ने ‘गुमराह’  

जो भागे ही जा रहे है आसमान छोड़कर  ।


 अभी भी ठहरे अटके हुए से है ,कुछ बादल

दामन नहीं छोड़ना चाह रहे है आसमाँ का

‘मचलती हवा’ तो अब भी बाज नहीं आ रही,

दिखने लगे बेबस ,अब तो ये “गुमराह बादल”                                  पर, लिए जा रही है सबको , आगे-आगे भगाकर  ।।

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