बेरंग तस्वीर
बेचैन होता था दिल ,जिन पलों को याद करके
बढ़ आए आगे उनसे , थोड़ी फरियाद करके
भर लिए आशाओं के रंग, सहज सहज फैलाकर
बदल रहीं ज़िंदगी की बेरंग तस्वीर ,
हौले से मुस्कुराकर ।
ऐसा नहीं कि कभी कोशिश की नहीं बढ़ने की
पर शायद कोई सडक बनी ही नहीं थी मेरे लिए,
लू के थपेड़ों से धक्के लगते रहे ज़िंदगी भर ,
ना लोग बाज़ आए तकलीफ़ें देने से यूँ ही
ना हमने ही हिम्मत दिखाई कभी ,
सम्बल जाने की ।
चमकने लगी आँखे भी आत्मविश्वास आने से
जगा लिया ख़ुद को हमने, ‘ख़ुद से ही लड़कर’ ,
बदल कर रंगत ,सड़क अपने लिए संवारी ली
बदल देंगे अब क़िस्मत ज़िंदगी की,
“बेरंग तस्वीर” की ।।
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