थोड़ा सा
माँगा है खुदा से थोड़ा सा वक़्त और
रह गया है कुछ, ज़रूरी करने के लिए ,
बीते हुए लम्हों से भी गुज़ारिश की है मैंने
चलना साथ थोड़ा,रुक-रुककर मेरे लिए ।
ज़िम्मेदारियाँ तो बहुत बचीं हैं अब भी
धीरे-धीरे चलकर ही सही
जारी हैं पहुँचने की कोशिश फिर भी,
उस आख़िरी पड़ाव के लिए ।
बिना बोले,बिना बताए ही ,निकल गए
देखते देखते हाथों से ,कुछ अज़ीज़ रिश्ते,
नामुमकिन है लौट कर आना ,उनका अब
ज़रूरत थी जिनकी मुझे, ताउम्र के लिए ।
ज़्यादा कुछ तो नहीं माँगा
माँगा है वक़्त और “थोड़ा सा”
‘अब जीकर देख ले हम भी ज़रा सा ,
बचें हुए लम्हों को, सिर्फ़ और सिर्फ़
अपने लिए ।।
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